Rahul Gandhi के 'कैजुअल लुक' ने छेड़ी नई बहस; सत्ता पक्ष और विपक्ष में तकरार
संसद में रासंसद में राहुल गांधी के कपड़ों को लेकर मचा बवाल! विपक्ष के नेता के खाकी ट्राउजर पर बीजेपी ने उठाए सवाल, शुरू हुई 'ड्रेस कोड' पर बड़ी राजनीतिक बहस। पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें। के कपड़ों को लेकर मचा बवाल! विपक्ष के नेता के खाकी ट्राउजर पर बीजेपी ने उठाए सवाल, शुरू हुई 'ड्रेस कोड' पर बड़ी राजनीतिक बहस। पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।

Rahul Gandhi
Parliament budget session 2026 : लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर, भारतीय संसद में बजट सत्र के दूसरे चरण का आगाज होते ही गलियारों में एक नई और दिलचस्प बहस छिड़ गई है। यह बहस किसी नीति या विधेयक पर नहीं, बल्कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी के पहनावे को लेकर शुरू हुई है। सोमवार को जब राहुल गांधी बजट सत्र की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए संसद परिसर पहुँचे, तो उनके परिधान ने राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक हलचल मचा दी। एक ओर जहाँ बजट पर गंभीर चर्चा की उम्मीद की जा रही थी, वहीं अब नेताओं के 'ड्रेस कोड' पर वार-पलटवार का दौर जारी है।
समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) द्वारा जारी किए गए एक वीडियो में राहुल गांधी ढीले खाकी पैंट और टी-शर्ट में संसद भवन में प्रवेश करते दिखाई दिए। उनके इस 'कैजुअल लुक' को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के समर्थकों और कई आलोचकों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। आलोचकों ने उनके पैंट को 'पायजामा' करार देते हुए तर्क दिया है कि संसद जैसी गरिमामयी संस्था के प्रति सम्मान दिखाने के लिए एक औपचारिक मर्यादा होनी चाहिए। विरोधियों का कहना है कि राहुल गांधी विदेशों में आधिकारिक दौरों के दौरान सूट और औपचारिक परिधानों में नजर आते हैं, लेकिन देश की संसद में उनका यह व्यवहार संस्था के प्रति उनकी गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।
हालाँकि, कांग्रेस और विपक्ष के समर्थकों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे सत्ता पक्ष की ओछी राजनीति करार दिया है। बचाव पक्ष का तर्क है कि भारत की संसद में सांसदों के लिए कोई विशेष या अनिवार्य 'ड्रेस कोड' लागू नहीं है। ऐतिहासिक रूप से भारतीय संसद में सांस्कृतिक विविधता की झलक मिलती रही है, जहाँ माननीय सदस्य कुर्ता-पाजामा, धोती-कुर्ता, सफारी सूट से लेकर पश्चिमी औपचारिक कपड़ों (वेस्टर्न फॉर्मल्स) तक में नजर आते रहे हैं। राहुल के समर्थकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पारंपरिक 'कुर्ता-चूड़ीदार' और जैकेट का उदाहरण देते हुए कहा कि पहनावा व्यक्तिगत पसंद और भारतीय संस्कृति का हिस्सा है, जिसे राजनीति का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।
संसदीय नियमों और कानूनी पहलुओं की बात करें तो भारत की संसद में सदस्यों के लिए कोई लिखित नियमावली नहीं है जो उन्हें विशिष्ट कपड़े पहनने के लिए बाध्य करती हो। आमतौर पर यह उम्मीद की जाती है कि सदस्य 'गरिमामय' वस्त्र पहनें, लेकिन 'गरिमा' की परिभाषा व्यक्तिगत और सांस्कृतिक व्याख्याओं पर टिकी है। इससे पहले भी कई बार सांसदों के पहनावे पर सदन के भीतर चर्चा हो चुकी है, परंतु हर बार यही निष्कर्ष निकला है कि जब तक परिधान शालीन है, तब तक उस पर आपत्ति नहीं की जा सकती।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बजट सत्र जैसे महत्वपूर्ण समय पर इस तरह के विवाद का उठना सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक तनाव का संकेत है। 2 अप्रैल तक चलने वाले इस सत्र में जहाँ केंद्रीय बजट पर महत्वपूर्ण चर्चा होनी है, वहीं पहनावे जैसे विषय पर केंद्रित बहस मुख्य मुद्दों से ध्यान भटका सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आगामी दिनों में संसद की मर्यादा और परंपराओं को लेकर कोई नई संहिता बनाने पर विचार होगा या यह विवाद भी राजनीति की भेंट चढ़कर शांत हो जाएगा।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
