क्या राहुल गांधी ब्रिटिश नागरिक हैं? जानें इलाहाबाद HC ने क्यों दिया FIR दर्ज करने का आदेश?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राहुल गांधी पर ब्रिटिश नागरिकता के आरोपों के चलते एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। 2003 में कंपनी पंजीकरण से जुड़े दस्तावेजों और कथित दोहरी नागरिकता के आधार पर जांच शुरू होगी। यह फैसला राजनीतिक और कानूनी रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी
राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाने वाले एक अहम घटनाक्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया है। यह आदेश उस याचिका के बाद आया है जिसमें उन पर भारतीय नागरिकता के साथ-साथ ब्रिटिश नागरिकता रखने का आरोप लगाया गया है। अदालत के इस फैसले ने न केवल कानूनी बहस को तेज कर दिया है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने लखनऊ की एक निचली अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने से इनकार किया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर मामले में जांच आवश्यक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालत का विस्तृत आदेश अभी आना बाकी है।
यह मामला BJP कार्यकर्ता एस. विग्नेश शिशिर की याचिका पर आधारित है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि राहुल गांधी ने वर्ष 2003 में “एम/एस बैकऑप्स लिमिटेड” नामक एक कंपनी के पंजीकरण के दौरान स्वयं को ब्रिटिश नागरिक घोषित किया था। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि कंपनी के वार्षिक रिटर्न, जो अक्टूबर 2005 और अक्टूबर 2006 में दाखिल किए गए थे, उनमें भी उनकी राष्ट्रीयता ब्रिटिश दर्ज की गई थी। इसके अलावा, कंपनी से जुड़े दस्तावेजों में लंदन और हैम्पशायर के पते तथा डायरेक्टर आइडेंटिफिकेशन आईडी का उल्लेख होने की बात भी सामने आई है। बाद में यह कंपनी फरवरी 2009 में भंग कर दी गई थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह भी प्रस्तुत किया कि उपलब्ध दस्तावेजों से यह संकेत मिलता है कि राहुल गांधी संभवतः यूनाइटेड किंगडम में मतदाता के रूप में सूचीबद्ध थे और वहां की चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी भी की थी। इस दौरान केंद्र सरकार की ओर से उप सॉलिसिटर जनरल एस.बी. पांडे ने नागरिकता से जुड़े रिकॉर्ड अदालत में प्रस्तुत किए, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अधिवक्ता वी.के. सिंह ने यह माना कि आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं।
गौरतलब है कि इस मामले की शुरुआत रायबरेली की विशेष सांसद/विधायक अदालत में दाखिल शिकायत से हुई थी। बाद में 17 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने इस मामले को रायबरेली से लखनऊ स्थानांतरित कर दिया। लखनऊ की अदालत ने 28 जनवरी 2026 को एफआईआर दर्ज करने की मांग को खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। भारतीय कानून के तहत दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं है, विशेष रूप से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए यह एक गंभीर कानूनी मुद्दा माना जाता है। ऐसे में यह मामला संवैधानिक और कानूनी दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बन जाता है।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाईकोर्ट का यह आदेश किसी दोष सिद्धि का संकेत नहीं है, बल्कि केवल आरोपों की जांच के लिए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश है। आगे की प्रक्रिया में जांच एजेंसियों की भूमिका अहम होगी और मामले की सच्चाई कानूनी जांच के बाद ही सामने आएगी। इस घटनाक्रम ने न केवल न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को रेखांकित किया है, बल्कि देश की राजनीति में भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
