पिछले 45 दिनों में भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे के शीर्ष स्तर पर बड़े बदलाव किए हैं। इस दौरान नए नौसेना प्रमुख, थलसेना प्रमुख, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) प्रमुख और नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की नियुक्ति हुई है, जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र का केंद्र माना जाता है। अगले 75 दिनों में देश को नया वायुसेना प्रमुख भी मिलने वाला है।

लेख में कहा गया है कि मोदी सरकार ने माओवाद, मणिपुर को छोड़कर पूर्वोत्तर और पहलगाम नरसंहार के बाद कश्मीर घाटी से जुड़े सुरक्षा चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। हालांकि अब पंजाब में एक नया राष्ट्रीय सुरक्षा संकट उभरता दिखाई दे रहा है। शिरोमणि अकाली दल (बादल) के राजनीतिक प्रभाव में कमी और पंथिक ताकतों पर उसकी पकड़ कमजोर होने से बने राजनीतिक खालीपन में अगले वर्ष होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले चुनावी लाभ के लिए छोटे कट्टरपंथी समूह सक्रिय हो रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब के 1980-1990 के उस दौर को फिर से उभारने की कोशिश की जा रही है, जब कमजोर या अप्रभावी केंद्र सरकारों के दौरान पाकिस्तान के डीप स्टेट ने कश्मीर और खालिस्तान के नाम पर राज्य की आंतरिक सुरक्षा को अस्थिर किया था। इसमें यह भी कहा गया है कि उस समय अफगानिस्तान में सोवियत कब्जे के खिलाफ लड़ाई में रावलपिंडी द्वारा दी गई मदद के बदले अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों का भी पाकिस्तान को समर्थन मिला था।

लेख में दावा किया गया है कि पाकिस्तान आज भी भारत की पश्चिमी सीमा पर ड्रोन के जरिए मादक पदार्थ और हथियार भेजकर पंजाब में आतंकवाद को समर्थन देने वाले एक आत्मनिर्भर नेटवर्क को बनाए हुए है। इसमें कहा गया है कि ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका की मध्यस्थता में पाकिस्तान की भूमिका और मध्य-पूर्व की स्थिति से जुड़े घटनाक्रम के बीच पंजाब पर फिर दबाव बढ़ रहा है। साथ ही आरोप लगाया गया है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के जरिए प्रचार आधारित फिल्मों के माध्यम से पंजाब पुलिस और सुरक्षा बलों की छवि खराब करने का प्रयास किया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 1980-1990 के दशक में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि उसी दौर में पाकिस्तान समर्थित उग्रवादियों द्वारा सुरक्षा बलों और अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाए जाने का उल्लेख नहीं किया जाता। लेख में कहा गया है कि पंजाब में धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है और राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी की प्रभावी शासन व्यवस्था के अभाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, क्योंकि मुख्यमंत्री की राजनीतिक शक्ति पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर निर्भर बताई गई है।

लेख में यह भी कहा गया है कि पंजाब में राजनीतिक और उग्रवादी तत्वों का मिश्रण पहले से अधिक अस्थिर हो गया है, क्योंकि आतंकवादी मॉड्यूल की जगह अब अंतरराष्ट्रीय गैंग सक्रिय हो गए हैं। लोक संगीत गायक उग्रवादी तत्वों और गैंगस्टरों का महिमामंडन कर रहे हैं, जिससे युवाओं के सामने गलत आदर्श स्थापित हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, युवाओं की आकांक्षाएं अब कनाडा, ब्रिटेन, नॉर्वे या जर्मनी का वीजा हासिल करने तक सीमित होती जा रही हैं।

लेख में कहा गया है कि भारत के इस महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य में तेजी से बढ़ते ध्रुवीकरण को देखते हुए नव नियुक्त सुरक्षा प्रमुखों को निष्क्रियता छोड़कर पाकिस्तान से आने वाले खतरों की बेहतर समझ विकसित करनी होगी। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थानों को केवल फाइल आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर जोखिम उठाने वाली कार्यशैली अपनाने की आवश्यकता बताई गई है। लेख के अनुसार, केवल तकनीकी खुफिया जानकारी पर निर्भर रहने के बजाय कार्रवाई योग्य मानव खुफिया जानकारी जुटाने और प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने पर निवेश करना समय की मांग है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध के साधन, तकनीक और आतंकवादी तथा गैंगस्टरों के तौर-तरीके बदल चुके हैं, लेकिन संस्थागत सोच अब भी पुरानी बनी हुई है। इसमें यह भी कहा गया है कि खुफिया एजेंसियों और सैन्य संस्थानों के प्रमुखों के चयन में योग्यता, जोखिम उठाने की क्षमता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता को महत्व दिया जाना चाहिए, न कि ऐसे नेतृत्व को जो हर निर्णय के लिए राजनीतिक नेतृत्व की ओर देखता रहे।

लेख के अंत में कहा गया है कि मोदी सरकार के दौरान भारत की बढ़ती वैश्विक आकांक्षाओं के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां भी बढ़ेंगी, क्योंकि दुनिया में कोई भी उभरती महाशक्ति के लिए आसानी से स्थान नहीं छोड़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की प्रगति को रोकने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के प्रयास होंगे तथा ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से कथित रूप से भ्रामक नैरेटिव भी फैलाए जाएंगे। लेख में निष्कर्ष दिया गया है कि इन चुनौतियों का सामना केवल मजबूत पूर्व-निवारक क्षमता और प्रभावी प्रतिरोधक रणनीति से ही किया जा सकता है। इसके लिए योग्यता और जोखिम उठाने की क्षमता वाले राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुखों की आवश्यकता बताई गई है। लेख के अनुसार, आने वाले महीनों में पंजाब इस नई सुरक्षा व्यवस्था की पहली बड़ी परीक्षा बन सकता है और नए सुरक्षा प्रमुखों के सामने यह महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

Pratahkal Bureau

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