नई दिल्ली। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा में प्रस्तावित बदलावों को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने सरकार के कदमों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे संविधान की मूल भावना और आम नागरिकों के रोजगार के अधिकार पर सीधा हमला करार दिया है। उन्होंने कहा कि जिस योजना ने ग्रामीण भारत को आर्थिक सुरक्षा दी, उसे कमजोर करने की कोशिशें गंभीर परिणाम ला सकती हैं।

केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि सरकार मनरेगा को उसकी मूल मांग-आधारित प्रकृति से हटाकर बजट की सीमाओं में बांधने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उनका कहना है कि इससे योजना का सार्वभौमिक स्वरूप समाप्त हो जाएगा और ग्रामीण परिवारों को मिलने वाली रोजगार की कानूनी गारंटी महज कागजी औपचारिकता बनकर रह जाएगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यह बदलाव काम के अधिकार की उस बुनियादी अवधारणा को ही खत्म कर देगा, जिसके आधार पर मनरेगा को लागू किया गया था।

कांग्रेस नेता ने सरकार के 125 दिनों के रोजगार के वादे पर भी सवाल उठाए। उन्होंने इसे अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि इस वादे का वित्तीय बोझ सीधे राज्यों पर डाल दिया गया है, जिससे इसके प्रभावी क्रियान्वयन की संभावनाएं बेहद कमजोर हो जाती हैं। वेणुगोपाल के अनुसार, केंद्र और राज्यों के बीच जिम्मेदारी का यह असंतुलन ग्रामीण रोजगार व्यवस्था को और अधिक अस्थिर कर सकता है।

इसके साथ ही उन्होंने कृषि मंत्री द्वारा लाए गए प्रस्तावित विधेयक पर तीखा हमला बोला। वेणुगोपाल ने कहा कि इस विधेयक के जरिए उस योजना से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम हटाने की कोशिश की जा रही है, जो उनकी विचारधारा और ग्राम स्वराज की सोच से प्रेरित थी। उन्होंने इसे एक ऐसा कदम बताया जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा और जो ऐतिहासिक और वैचारिक दृष्टि से गंभीर सवाल खड़े करता है।

मनरेगा में नाम और संरचना को लेकर उठे इन सवालों ने न केवल राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है, बल्कि ग्रामीण रोजगार, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में देश की नीति पर भी गहरी छाया डाल दी है। आने वाले समय में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक व्यापक चर्चा का विषय बनने के संकेत दे रहा है।

Next Story