इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत में जहाँ एक ओर हम विज्ञान और तकनीक के शिखर को छू रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश के कुछ हिस्सों में आज भी सदियों पुरानी ऐसी परंपराएं जीवित हैं जो मानवता और कानून दोनों को झकझोर कर रख देती हैं। तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के अंतर्गत आने वाले पुथुर गांव से एक ऐसी ही दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है, जहाँ 'आस्था' के नाम पर बेजुबान जानवरों के साथ एक 'खूनी खेल' खेला जा रहा है। स्थानीय स्तर पर 'कुट्टी कुडिपु' के नाम से विख्यात इस उत्सव ने एक बार फिर परंपरा और पशु क्रूरता के बीच की बहस को गरमा दिया है।

इस प्राचीन परंपरा का केंद्र भगवान मलै करप्पासामी का मंदिर है, जिनके सम्मान में ग्रामीण इस रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुष्ठान का आयोजन करते हैं। ग्रामीणों की अटूट मान्यता है कि इस प्रथा के पालन से उनके गांव पर दैवीय कृपा बनी रहती है, महामारियां दूर भागती हैं और खेतों में फसलों की पैदावार भरपूर होती है। अपनी मन्नतों के पूरा होने की खुशी में श्रद्धालु बड़ी संख्या में मेमनों (बकरी के बच्चों) को मंदिर में दान स्वरूप लेकर आते हैं, लेकिन इसके बाद जो दृश्य उभरता है वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकता है।

उत्सव के चरम पर, मंदिर के पुजारी, जिन्हें स्थानीय लोग 'ओरेकल' या साक्षात भगवान का रूप मानते हैं, के सामने इन मासूम मेमनों को हवा में उछाला जाता है। इस अनुष्ठान का सबसे विवादित और विचलित करने वाला हिस्सा तब शुरू होता है जब पुजारी हवा में उछलते हुए या नीचे गिरते हुए मेमने को दबोच लेते हैं और अपनी गर्दन झुकाकर सरेआम मेमने की गर्दन को अपने दांतों से काट देते हैं। पुजारी द्वारा मेमने का कच्चा खून पीने का यह दृश्य वहां मौजूद हजारों की भीड़ के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव होता है, जबकि बाहरी दुनिया के लिए यह घोर बर्बरता है। खून पीने के बाद लहूलुहान मेमने को बेतरतीब तरीके से भीड़ की ओर फेंक दिया जाता है।

कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो यह कृत्य 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960' का सीधा उल्लंघन है, जो किसी भी जानवर को अनावश्यक पीड़ा देने या बलि देने के ऐसे हिंसक तरीकों पर पूर्णतः रोक लगाता है। पेटा (PETA India) जैसे अंतरराष्ट्रीय पशु अधिकार संगठन वर्षों से इस प्रथा को 'बर्बर' और 'पाशविक' करार देते हुए इस पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं। प्रशासन और स्थानीय पुलिस भी समय-समय पर कार्रवाई करती है और आयोजकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती है, परंतु जनभावनाओं और गहरी धार्मिक जड़ों के कारण इस खूनी खेल को पूरी तरह रोक पाना अब तक एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

गांव के बुजुर्गों और स्थानीय निवासियों का तर्क है कि यह उनके पूर्वजों की विरासत है और इसे हिंसा की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उनका मानना है कि उस विशेष क्षण में पुजारी के भीतर एक 'दिव्य शक्ति' का संचार होता है और यह कृत्य मात्र एक धार्मिक संस्कार है। हालांकि, समाज का एक बड़ा वर्ग अब यह सवाल उठा रहा है कि क्या ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए बेजुबान मासूमों की ऐसी तड़प अनिवार्य है? पुथुर का यह 'कुट्टी कुडिपु' उत्सव आज परंपरा और आधुनिक नैतिकता के बीच एक बड़े टकराव का प्रतीक बन चुका है।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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