प्रयागराज कोर्ट का शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर गहरा आरोप ; उनके शिष्य पर भी गिरेगी गाज, क्या है पूरा मामला?
प्रयागराज की विशेष POCSO अदालत ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य के खिलाफ कथित नाबालिग यौन शोषण मामले में FIR दर्ज करने का आदेश दिया। अदालत ने पुलिस को जांच शुरू करने के निर्देश दिए। जानिए पूरे मामले की पृष्ठभूमि, कानूनी प्रक्रिया और आगे क्या होगा।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
प्रयागराज से सामने आई एक महत्वपूर्ण कानूनी घटना ने धार्मिक और सामाजिक हलकों में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। बाल लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत गठित विशेष न्यायालय ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद गिरी के खिलाफ कथित यौन शोषण और दुराचार के आरोपों में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया का एक अहम पड़ाव माना जा रहा है, जिसने पूरे मामले को औपचारिक जांच के दायरे में ला दिया है।
कैसे शुरू हुआ मामला:
मामले की शुरुआत एक शिकायतकर्ता कुछ रिपोर्टों के अनुसार अशुतोष ब्रह्मचारी द्वारा विशेष POCSO अदालत में याचिका दायर किए जाने से हुई। याचिका में आरोप लगाया गया कि माघ मेला के दौरान स्वामी के शिविर में नाबालिग बच्चों के साथ यौन शोषण हुआ। शिकायत में यह भी कहा गया कि पुलिस ने संज्ञेय अपराध होने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं की, जिसके बाद अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई।
Uttar Pradesh | ADJ Rape and POCSO Special Court in Prayagraj has directed the police to register an FIR against Swami Avimukteshwaranand Saraswati in connection with allegations of sexual exploitation.
— ANI (@ANI) February 21, 2026
ADJ (POCSO Act) Vinod Kumar Chaurasia ordered the registration of an FIR…
अदालत की कार्यवाही और न्यायिक आदेश:
विशेष POCSO न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रखा था। सुनवाई के दौरान कथित नाबालिग पीड़ितों के बयान भी दर्ज किए गए। प्रस्तुत साक्ष्यों में एक सीडी भी शामिल बताई गई, जिसे शिकायतकर्ता ने संभावित प्रमाण के रूप में अदालत के समक्ष रखा।
21 फरवरी 2026 को POCSO विशेष न्यायाधीश, एडीजे (POCSO Act) विनोद कुमार चौरसिया ने आदेश जारी करते हुए झूंसी थाने को संबंधित धाराओं में FIR दर्ज कर विधिवत जांच शुरू करने का निर्देश दिया। अदालत का यह निर्देश दंड प्रक्रिया संहिता के उस प्रावधान के अंतर्गत आया, जिसके तहत यदि पुलिस संज्ञेय अपराध में प्राथमिकी दर्ज नहीं करती है तो पीड़ित मजिस्ट्रेट से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग कर सकता है।
कानूनी और प्रक्रियात्मक महत्व:
अदालत द्वारा FIR दर्ज करने का आदेश कई मायनों में महत्वपूर्ण है:
- न्यायिक हस्तक्षेप का प्रयोग – जब पुलिस कार्रवाई में देरी या निष्क्रियता का आरोप हो, तब अदालत का हस्तक्षेप अनिवार्य हो सकता है।
- POCSO मामलों की संवेदनशीलता – बच्चों से जुड़े अपराधों में अदालतें प्रारंभिक स्तर पर भी गंभीरता बरतती हैं।
- औपचारिक जांच की शुरुआत – FIR दर्ज होने के बाद पुलिस बाध्य होती है कि वह साक्ष्य एकत्र करे, गवाहों के बयान ले और आवश्यकता पड़ने पर आरोपपत्र दायर करे।
यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि इस चरण पर आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। FIR केवल जांच की औपचारिक शुरुआत है। जांच के बाद ही यह तय होगा कि मामला आरोपपत्र तक पहुंचेगा या नहीं।
आरोप क्या कहते हैं?
रिपोर्टों के अनुसार शिकायत में कहा गया है कि माघ मेले के दौरान स्वामी के शिविर में नाबालिगों के साथ यौन शोषण की घटनाएं हुईं। दो कथित पीड़ितों के बयान अदालत में दर्ज किए गए बताए जाते हैं। शिकायतकर्ता ने डिजिटल साक्ष्य प्रस्तुत करने का दावा भी किया है। हालांकि, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इन आरोपों से इनकार किया है। मीडिया में दिए गए बयानों में उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई उनके सार्वजनिक रुख, विशेषकर गौ संरक्षण और प्रशासनिक नीतियों पर उठाए गए सवालों से जुड़ी व्यापक विवादों का हिस्सा है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष:
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें फर्जी बताया है। उन्होंने कहा कि सच्चाई सामने आएगी और न्यायालय को शीघ्र कार्रवाई करनी चाहिए। उनका कहना है कि उनके खिलाफ झूठा मुकदमा दायर किया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता स्वयं इतिहासशीटर है और उसका नाम कई मामलों में दर्ज है। स्वामी ने यह भी कहा कि वे कानूनी लड़ाई का सामना करेंगे और न्यायिक प्रक्रिया में पूरा सहयोग देंगे।
माघ मेला और पृष्ठभूमि के विवाद:
यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का नाम पहले से ही माघ मेले के दौरान प्रशासन के साथ विवादों के कारण सुर्खियों में रहा है।
- मेले के प्रोटोकॉल को लेकर प्रशासन से टकराव
- गौ संरक्षण जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर मुखर बयान
- धार्मिक और प्रशासनिक अधिकारों को लेकर सार्वजनिक बहस
इन घटनाओं ने पहले ही वातावरण को संवेदनशील बना दिया था। ऐसे में अदालत का आदेश व्यापक जनचर्चा का विषय बन गया है। हालांकि, न्यायिक दृष्टि से FIR का आधार केवल कथित यौन शोषण से जुड़े आरोप और अदालत के समक्ष प्रस्तुत सामग्री है।
आगे की प्रक्रिया:
अब जब झूंसी थाने में FIR दर्ज की जाएगी, तो पुलिस निम्नलिखित कदम उठाएगी:
- POCSO अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं में जांच
- कथित पीड़ितों और गवाहों के बयान
- डिजिटल एवं फॉरेंसिक साक्ष्यों की जांच
- पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर आरोपपत्र दाखिल करना
यदि जांच में पर्याप्त आधार नहीं मिलता, तो पुलिस अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर सकती है, जिसे न्यायालय की स्वीकृति आवश्यक होगी।
यह मामला केवल एक धार्मिक व्यक्तित्व के खिलाफ आरोप भर नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया, पुलिस कार्रवाई और बाल संरक्षण कानूनों की प्रभावशीलता की भी परीक्षा है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा और निष्कर्ष ही यह तय करेंगे कि यह प्रकरण किस मोड़ पर पहुंचता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
