West Bengal Assembly Elections 2026 : पश्चिम बंगाल की राजनीतिक फिजाओं में इस समय चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है। जैसे-जैसे 23 अप्रैल की तारीख नजदीक आ रही है, सत्ता की लड़ाई और भी तीखी और व्यक्तिगत होती जा रही है। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हल्दिया और आसनसोल की धरती से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पर अब तक का सबसे बड़ा हमला बोला है। औद्योगिक गिरावट, बेरोजगारी और महिला सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों को ढाल बनाकर प्रधानमंत्री ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि बंगाल की प्रतिष्ठा को बहाल करने का समय आ गया है और राज्य की जनता अब 'भय की राजनीति' से मुक्ति चाहती है।

इस चुनावी समर में 'मछली' और 'तुष्टीकरण' जैसे मुद्दे केंद्र बिंदु बनकर उभरे हैं। हल्दिया की रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल के गिरते मत्स्य उत्पादन पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे टीएमसी की विफलता करार दिया। उन्होंने तुलनात्मक आंकड़े पेश करते हुए बताया कि कैसे बिहार और असम जैसे राज्य मत्स्य उत्पादन में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं, जबकि बंगाल का योगदान निरंतर घट रहा है। यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि बंगाल की अस्मिता और खान-पान से जुड़ा एक गहरा भावनात्मक प्रहार था, जिसे भाजपा ने चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। प्रधानमंत्री ने मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए एनडीए सरकार द्वारा किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए मछुआरा समुदाय को भाजपा के पाले में लाने की पुरजोर कोशिश की।


दूसरी ओर, चुनावी माहौल को दो वायरल वीडियो ने और भी अधिक सनसनीखेज बना दिया है। एक ओर जहां मुस्लिम वोट बैंक को लेकर टीएमसी और कांग्रेस के प्रति 100% वफादारी का दावा करने वाले दुकानदार का वीडियो चर्चा में है, वहीं टीएमसी के एक निलंबित विधायक द्वारा लगाया गया '1,000 करोड़ रुपये का सौदा' वाला आरोप आग में घी डालने का काम कर रहा है। इन आरोपों ने राज्य में ध्रुवीकरण की राजनीति को नई हवा दी है। भाजपा जहां हिंदू बहुल क्षेत्रों में अपनी 2021 की बढ़त को अभेद्य किले में तब्दील करना चाहती है, वहीं टीएमसी अल्पसंख्यकों के ठोस समर्थन के भरोसे अपनी सत्ता बचाने की जद्दोजहद में है।


चुनाव आयोग की पैनी नजर के बीच, कानून और व्यवस्था की स्थिति भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। आसनसोल और हल्दिया की रैलियों में उमड़ी भीड़ को भाजपा बंगाल में 'बदलाव की लहर' के रूप में पेश कर रही है। प्रधानमंत्री के भाषणों में तुष्टीकरण की राजनीति के प्रति कड़ा विरोध और विकास का वादा एक संतुलित मिश्रण के रूप में उभर कर आया है। अब सभी की निगाहें 23 अप्रैल के मतदान और उसके बाद 4 मई को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं। क्या हल्दिया की यह ऊर्जा और मत्स्य उत्पादन जैसे जमीनी मुद्दे वास्तव में बंगाल की सत्ता का समीकरण बदल पाएंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। यह चुनाव केवल एक सरकार चुनने का नहीं, बल्कि बंगाल के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक मोड़ साबित होने जा रहा है।

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Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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