पतंजलि मृदा परीक्षण और पांडुलिपि संरक्षण पर हरिद्वार में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित
कार्यक्रम में 'धरती का डॉक्टर' मशीन का प्रदर्शन किया गया और वरिष्ठ संरक्षक अर्चना गहलोत ने ऐतिहासिक पांडुलिपियों के वैज्ञानिक रखरखाव की तकनीकें सिखाईं।

हरिद्वार में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान ऐतिहासिक पांडुलिपियों के रख-रखाव और दीर्घकालिक वैज्ञानिक संरक्षण की बारीकियों को समझतीं वरिष्ठ संरक्षक अर्चना गहलोत (सफेद साड़ी में) और अन्य प्रतिभागी।
हरिद्वार। कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में आयोजित एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने नवीनतम तकनीकों पर विस्तृत प्रकाश डाला। कार्यक्रम में प्रतिभागियों को भारत में पाई जाने वाली आठ प्रमुख प्रकार की मिट्टियों और वैज्ञानिक मृदा परीक्षण की जटिल प्रक्रियाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। इस दौरान पतंजलि द्वारा विकसित ‘धरती का डॉक्टर’ नामक ऑटोमेटेड मृदा परीक्षण मशीन विशेष आकर्षण का केंद्र रही, जिसकी कार्यप्रणाली को विशेषज्ञों ने बारीकी से समझाया।
वैज्ञानिक सत्र के दौरान एटोमिक एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रोफोटोमेट्री, यूवी-विज़ स्पेक्ट्रोफोटोमीटर एवं फ्लेम फोटोमीटर सहित विभिन्न अत्याधुनिक उपकरणों का सजीव प्रदर्शन किया गया। वक्ताओं ने तकनीकी गहराई में जाते हुए बताया कि इन आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से मिट्टी की गुणवत्ता, आवश्यक पोषक तत्वों और उसकी वास्तविक उर्वरता का अत्यंत सटीक परीक्षण अब संभव हो चुका है। इस प्रकार की उन्नत जांच से न केवल मिट्टी के स्वास्थ्य का सही आकलन होता है, बल्कि कृषि उत्पादन को गुणात्मक और मात्रात्मक रूप से बेहतर बनाने में भी बड़ी सहायता मिलती है।
इसी क्रम में, विरासत संरक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए जीबीएम, नई दिल्ली की वरिष्ठ संरक्षक अर्चना गहलोत ने एक दीर्घकालीन प्रयोगात्मक सत्र का संचालन किया। उन्होंने ऐतिहासिक पांडुलिपियों के अवलोकन, रख-रखाव एवं दीर्घकालिक संरक्षण से संबंधित विभिन्न जटिल तकनीकों की विस्तृत जानकारी साझा की। अर्चना गहलोत ने अमूल्य हस्तलिपियों के संरक्षण में माइक्रोफिल्मिंग एवं फोटोग्राफिक तकनीकों की महत्ता पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने पांडुलिपियों को नमी से बचाने के प्रभावी वैज्ञानिक उपायों का प्रायोगिक प्रदर्शन भी किया।
वरिष्ठ संरक्षक ने इस बात पर विशेष बल दिया कि हस्तलिपियों की विशेष साज-सज्जा, बाइंडिंग तथा उनके सुरक्षित प्रबंधन के लिए विशिष्ट उपकरणों एवं उच्च गुणवत्ता वाली सामग्रियों का उपयोग अत्यंत आवश्यक है। उचित और वैज्ञानिक संरक्षण तकनीकों के माध्यम से ही इन ऐतिहासिक पांडुलिपियों को किसी भी प्रकार की भौतिक एवं प्राकृतिक क्षति, हानिकारक कीट-पतंगों, धूल तथा अन्य हानिकारक बाहरी प्रभावों से पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सकता है। यह आयोजन आधुनिक कृषि विज्ञान और प्राचीन ज्ञान के संरक्षण के अद्भुत समन्वय के रूप में संपन्न हुआ।

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