पहलगाम आतंकी हमला: एनआईए चार्जशीट में स्थानीय गाइडों की भूमिका का खुलासा
एनआईए की चार्जशीट के अनुसार, पहलगाम हमले में शामिल आतंकियों को स्थानीय गाइडों द्वारा पनाह, भोजन और सुरक्षा जानकारी दी गई थी।

पहलगाम के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पर हुए भीषण आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट से एक अत्यंत चौंकाने वाला और गंभीर खुलासा हुआ है, जिसने यह साबित कर दिया है कि यदि घाटी के दो स्थानीय गाइड परवेज और बशीर अहमद ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती, तो 26 बेगुनाहों की जान बचाई जा सकती थी। पर्यटकों की कमाई पर आश्रित इन दोनों गाइडों की चुप्पी और आतंकियों को दी गई प्रत्यक्ष 'लोकल मदद' ने कश्मीर के इतिहास के सबसे वीभत्स आतंकी हमलों में से एक की पटकथा लिख दी थी।
जांच एजेंसी की चार्जशीट के अनुसार, घटना से एक दिन पूर्व यानी 21 अप्रैल को तीन आतंकी—फैजल जट्ट उर्फ सुलेमान, हबीब ताहिर उर्फ छोटू और हमजा अफगानी—पहलगाम क्षेत्र में सक्रिय थे। इन तीनों आतंकियों ने स्थानीय लोगों से संपर्क साधकर सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने की मांग की थी। एनआईए के समक्ष दर्ज अपने बयान में बशीर अहमद ने स्वीकार किया कि उसने इन तीनों को देखा था। आतंकियों के निर्देश पर बशीर उन्हें एक पेड़ के नीचे छोड़कर परवेज की झोपड़ी (ढोंक) पर पहुंचा और वहां परवेज व उसकी पत्नी को पूरी तरह चुप रहने के लिए निर्देशित किया।
शाम के करीब 5 बजे बशीर ने संकेतों के माध्यम से तीनों आतंकियों को बुलाया और परवेज की झोपड़ी में पहुंचा दिया। चार्जशीट स्पष्ट करती है कि उस समय आतंकियों के हाथों में हथियार थे और उनके बैग भी हथियारों से पूरी तरह भरे हुए थे। वे उर्दू भाषा में बात कर रहे थे, लेकिन उनका लहजा स्पष्ट रूप से पंजाबी था। बशीर ने पूछताछ के दौरान यह माना कि आतंकियों के हुलिए को देखकर वह भली-भांति समझ गया था कि ये 'मुजाहिद' यानी आतंकवादी हैं। आतंकियों ने स्वयं को बेहद थका और प्यासा बताते हुए अल्लाह के नाम पर मदद मांगी। इसके बाद परवेज और बशीर ने न केवल उन्हें पानी पिलाया, बल्कि चाय और भोजन की व्यवस्था भी की। जांच में पाया गया कि ये तीनों आतंकी करीब पांच घंटे तक उस झोपड़ी में छिपे रहे, जिसके दौरान उनकी और स्थानीय लोगों के बीच लंबी बातचीत भी हुई।
चार्जशीट के विवरण के अनुसार, इस दौरान आतंकियों ने अमरनाथ यात्रा, पहलगाम स्थित सुरक्षा बलों के कैंप, सेना की मूवमेंट और वहां की संपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां जुटाईं। एनआईए का कहना है कि परवेज और बशीर को इस बात का पूर्ण आभास था कि वे राष्ट्र-विरोधी तत्वों और आतंकियों की सहायता कर रहे हैं। रात के करीब 10 बजे जब आतंकी वहां से प्रस्थान करने लगे, तो परवेज और बशीर ने उन्हें 10 रोटियां और सब्जी पैक करके दी। साथ ही, आतंकी अपने साथ हल्दी, मिर्च, नमक, पतीला और करछी भी ले गए। इस 'आतिथ्य' के बदले में आतंकियों ने परवेज को 3,000 रुपये का भुगतान भी किया था।
जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि हमले वाले दिन यानी 22 अप्रैल को भी परवेज और बशीर ने उन्हीं तीनों आतंकियों को बैसरन पार्क के बाहर फेंस पर बैठे हुए देखा था। उस दिन वे दोनों दो पर्यटकों को लेकर बैसरन पार्क गए थे। जब वे पर्यटकों को वापस लेकर लौट रहे थे, तभी उनकी नजर इन आतंकियों पर पड़ी और वे सतर्क हो गए। कुछ देर बाद, जैसे ही वे नीचे पहलगाम पहुंचे, बैसरन घाटी में भीषण आतंकी हमला हो गया। इस हमले के बाद, दोनों स्थानीय गाइड चुपचाप भूमिगत हो गए। यह घटना इस बात का दुखद उदाहरण है कि किस प्रकार चंद रुपयों के लालच और स्थानीय सहयोग ने एक बड़े नरसंहार को अंजाम देने में आतंकियों की सहायता की।

