दयानंद सरस्वती के जयंती पर जानें कैसे उन्होंने 19वीं सदी में रखी आधुनिक भारत की नींव और क्या है आर्य समाज का इतिहास..
महर्षि दयानंद सरस्वती, आर्य समाज के संस्थापक और वेदों के प्रखर व्याख्याता, ने उन्नीसवीं सदी में सामाजिक सुधार और स्वराज का ऐतिहासिक उद्घोष किया। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के माध्यम से उन्होंने मूर्तिपूजा, अस्पृश्यता और कुरीतियों का विरोध करते हुए आधुनिक भारत की वैचारिक नींव रखी।

महर्षि दयानन्द सरस्वती
उन्नीसवीं सदी का भारत सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक जड़ताओं और औपनिवेशिक दबावों से जूझ रहा था। ऐसे दौर में एक संन्यासी ने निर्भीक स्वर में घोषणा की— “भारत भारतीयों का है।” यह आवाज थी महर्षि दयानंद सरस्वती की, जिनका जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में मूलशंकर तिवारी के रूप में हुआ। आगे चलकर वे हिंदू धर्म के प्रखर दार्शनिक, समाज-सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक बने।
बाल्यकाल से ही वैराग्य और सत्य की खोज की भावना ने उन्हें साधारण जीवन से अलग कर दिया। उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और वेदों को सर्वोच्च, अपौरुषेय और त्रुटिरहित ज्ञान का स्रोत माना। उनका विश्वास था कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ही धर्म के शुद्ध और मूल आधार हैं, जिन्हें सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर द्वारा प्रकट किया गया। वे मानते थे कि वेदों की गलत व्याख्याओं ने समाज में भ्रम और अंधविश्वास को जन्म दिया है, जबकि वेद विज्ञानसम्मत चिंतन और सत्य की खोज का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
महर्षि दयानंद ने मूर्तिपूजा और कर्मकांडों का विरोध किया तथा कहा कि धर्म का आधार तर्क, ज्ञान और नैतिक आचरण होना चाहिए। उनका ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ वेदों की दार्शनिक व्याख्या और मानव कर्तव्यों की स्पष्ट स्थापना के लिए आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थन किया तथा ब्रह्मचर्य, संयम और ईश्वर-भक्ति को जीवन का मूल आदर्श बताया।
सामाजिक क्षेत्र में उनका योगदान व्यापक और प्रभावशाली रहा। उन्होंने अस्पृश्यता का विरोध किया, स्त्री-शिक्षा और महिलाओं के समान अधिकारों का समर्थन किया तथा समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को चुनौती दी। उनके अनुसार सभी मनुष्य समान रूप से किसी भी उपलब्धि को प्राप्त करने में सक्षम हैं और समस्त प्राणी परमात्मा की शाश्वत प्रजा हैं।
1875 में उन्होंने मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’— अर्थात समस्त विश्व को श्रेष्ठ बनाओ— का संदेश दिया। आर्य समाज के दस सार्वभौमिक सिद्धांतों के माध्यम से उन्होंने समाज को नैतिकता, शिक्षा और सत्य के मार्ग पर अग्रसर करने का प्रयास किया।
दर्शन के क्षेत्र में भी उनका दृष्टिकोण व्यापक था। उन्होंने सांख्य, वैशेषिक, न्याय, योग, पूर्व मीमांसा और वेदांत— इन छह दर्शनों को वेदसम्मत और परस्पर पूरक बताया। उनका मत था कि ये सभी दर्शन सृष्टि के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट करते हैं और इनमें कोई अंतर्विरोध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि सांख्य दर्शन के आचार्य कपिल को नास्तिक बताना विद्वानों की भूल है।
राष्ट्रीय चेतना के स्तर पर महर्षि दयानंद का प्रभाव ऐतिहासिक रहा। 1876 में उन्होंने ‘स्वराज’ का उद्घोष करते हुए “भारत भारतीयों के लिए” का नारा दिया, जिसे आगे चलकर लोकमान्य तिलक ने भी अपनाया। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन तथा श्री अरविंद ने उन्हें “आधुनिक भारत के निर्माताओं” में गिना।
30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में उनका निधन हुआ, किंतु उनके विचार आज भी सामाजिक सुधार, धार्मिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय आत्मसम्मान की प्रेरणा बने हुए हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती का जीवन भारतीय समाज के आत्ममंथन और पुनरुत्थान की उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का प्रतीक है, जिसने आधुनिक भारत की वैचारिक आधारशिला को मजबूत किया।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
