उत्तर प्रदेश के न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले लोग अब अनुसूचित जाति (SC) के आरक्षित लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को “संविधान के साथ धोखा” बताते हुए कहा कि धार्मिक परिवर्तन के बाद एससी स्थिति बनाए रखना संवैधानिक मानकों का उल्लंघन है।

न्यायालय का तर्क है कि संविधान के अनुसूचित जाति आदेश, 1950 के तहत केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायी ही एससी लाभ के हकदार हैं। ईसाई धर्म में जातिगत व्यवस्था की कानूनी मान्यता नहीं होने के कारण, धर्म परिवर्तन के बाद जाति आधारित आरक्षण लाभ देने का कोई संवैधानिक आधार नहीं बचता। इस फैसले के तहत, उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया गया है कि ऐसे व्यक्तियों की पहचान की जाए जो ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के बावजूद एससी लाभ प्राप्त कर रहे हैं और उन्हें रोकने के लिए कार्रवाई की जाए। जिला प्रशासन को इस कार्य के लिए चार महीने की समय सीमा दी गई है।

इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव स्पष्ट है: किसी भी व्यक्ति द्वारा हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तन करने के बाद अब वह एससी आरक्षण, सरकारी नौकरियों, शिक्षा संस्थानों में आरक्षित सीटों और अन्य लाभ का दावा नहीं कर सकेगा। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि कोई व्यक्ति इस नियम का उल्लंघन करता है, तो उसे कानूनी रूप से दोषी ठहराया जा सकता है।

संबंधित मामला जिटरेंद्र साहनी नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जो ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के बाद अनुसूचित जाति लाभ ले रहा था। उच्च न्यायालय ने उनके याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जाति और धर्म के बीच संवैधानिक संबंध को तोड़कर लाभ प्राप्त करना संविधान के प्रति धोखा है। न्यायालय ने इसके लिए पिछले सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संविधान के प्रावधानों का हवाला भी दिया।

यह निर्णय न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में जाति, धर्म और आरक्षण नीति पर बहस को नई दिशा देगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संवैधानिक नियमों और धर्म परिवर्तन के बीच स्पष्ट रेखा खींचता है, जबकि आलोचक इसे धार्मिक स्वतंत्रता और जाति पहचान के परिप्रेक्ष्य में चुनौतीपूर्ण मान सकते हैं। प्रशासनिक स्तर पर इस निर्णय का पालन सुनिश्चित करना राज्य सरकारों के लिए एक महत्वपूर्ण कार्य होगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला संविधान के मूल सिद्धांतों और आरक्षण नीति की स्पष्ट व्याख्या करता है। यह निर्णय न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में भी अपनी छाप छोड़ने वाला है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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