भारत ने 1971 के युद्ध में अपनी निर्णायक 13-दिवसीय विजय की 54वीं वर्षगांठ बड़े गर्व और श्रद्धा के साथ मनाई। यह युद्ध, जो बांग्लादेश की स्वतंत्रता की नींव बना, भारतीय सेना के साहस, रणनीति और उत्कृष्ट समन्वय की मिसाल रहा। उस समय लाखों शरणार्थियों को पाकिस्तानी सेना के क्रूर अत्याचारों से बचाने के लिए भारत को हस्तक्षेप करना पड़ा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भारतीय थलसेना, वायुसेना, नौसेना और मुक्ति बहिनी के गुरिल्ला सेनानियों के अदम्य साहस और योगदान को याद किया। बांग्लादेश में भी विजय दिवस समारोह आयोजित किए गए, जिनमें दोनों देशों की साझा कुर्बानियों और सैन्य समर्पण को उजागर करने वाले कार्यक्रम प्रमुख रहे।

1971 की पृष्ठभूमि से युद्ध की शुरुआत स्पष्ट होती है। पाकिस्तान के तानाशाह याहिया ख़ां ने 25 मार्च को पूर्वी पाकिस्तान में जनभावनाओं को दबाने का आदेश दिया और शेख़ मुजीब को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद लाखों बांग्लादेशी शरणार्थी भारत की ओर पलायन करने लगे। भारत में इस स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैन्य हस्तक्षेप की योजना बनाई और अप्रैल में आक्रमण करने की तैयारी शुरू की।

हालांकि उस समय भारत के पास पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश के लिए सीमित संसाधन थे। केवल एक पर्वतीय डिवीजन उपलब्ध थी, और मानसून की चुनौती भी रही थी। थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेकशॉ ने स्पष्ट किया कि युद्ध में प्रवेश केवल पूरी तैयारी के साथ संभव होगा।

3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी वायुसेना ने भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा जैसे प्रमुख हवाई अड्डों पर बमबारी शुरू की। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तुरंत दिल्ली लौटकर आपात मंत्रिमंडलीय बैठक बुलाई।

युद्ध शुरू होते ही भारतीय सेना ने तेजी से आगे बढ़ते हुए जेसोर और खुलना पर कब्ज़ा किया। भारतीय रणनीति महत्वपूर्ण ठिकानों को छोड़ते हुए अग्रिम कार्रवाई की थी। 14 दिसंबर को भारतीय वायुसेना ने ढाका में गवर्नमेंट हाउस पर एक निर्णायक हवाई हमला किया, जिससे पाकिस्तानी अधिकारियों में हड़कंप मच गया।

16 दिसंबर की सुबह जनरल जैकब नियाज़ी को आत्मसमर्पण के लिए तैयार होने का आदेश मिला। ढाका में नियाज़ी के पास 26,400 सैनिक थे, जबकि भारत के पास केवल 3,000 सैनिक थे। भारतीय सेना ने युद्ध पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित किया। शाम साढ़े चार बजे जनरल अरोड़ा ने हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतार कर नियाज़ी के साथ आत्मसमर्पण दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। इस ऐतिहासिक क्षण में नियाज़ी की आँखों में आंसू भी आए।

युद्ध की इस विजय ने केवल भारत और बांग्लादेश के बीच रणनीतिक और सैन्य सफलता ही नहीं दिखाई, बल्कि मानवता, साहस और न्याय की भी मिसाल पेश की। संसद में इंदिरा गांधी के विजय की घोषणा के बाद पूरे देश में उत्सव और गर्व की लहर दौड़ गई। आज भी यह ऐतिहासिक जीत भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय मानी जाती है।

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Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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