11 अप्रैल 2026 को भारत एक ऐसे महान समाज सुधारक की 199वीं जयंती मना रहा है, जिन्होंने न केवल जातिगत भेदभाव की जड़ों को चुनौती दी, बल्कि शिक्षा और समानता के नए आयाम भी स्थापित किए। महत्मा ज्योतिराव फुले का जीवन संघर्ष, साहस और सामाजिक परिवर्तन की एक प्रेरणादायक गाथा है, जिसकी गूंज आज भी भारतीय समाज में सुनाई देती है।

सन् 1827 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे फुले ने एक ऐसे समय में समाज सुधार का बीड़ा उठाया, जब जाति और लिंग के आधार पर गहरी असमानताएं व्याप्त थीं। पारंपरिक रूप से माली समुदाय से आने वाले फुले ने बचपन में ही सामाजिक भेदभाव का सामना किया, जिसने उनके विचारों को गहराई से प्रभावित किया। 1848 में एक ब्राह्मण मित्र के विवाह में हुए अपमानजनक अनुभव ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने जाति-आधारित अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने का संकल्प लिया।

इसी वर्ष उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्वदेशी स्कूल शुरू किया। उस दौर में महिलाओं की शिक्षा को लेकर समाज में व्यापक विरोध था, लेकिन फुले दंपत्ति ने इस चुनौती का डटकर सामना किया। उनका यह प्रयास भारत में महिला शिक्षा की नींव रखने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ।

फुले ने न केवल महिलाओं के लिए शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि तथाकथित “अस्पृश्य” माने जाने वाले समुदायों के लिए भी विद्यालय खोले। उन्होंने समाज के वंचित वर्गों को शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनाने का अभियान चलाया। इसके साथ ही उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और 1863 में गर्भवती विधवाओं के लिए सुरक्षित आश्रय केंद्र स्थापित किया, जिससे शिशु हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों को रोकने का प्रयास किया गया।

1873 में फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाज में समानता, न्याय और तर्कशीलता को बढ़ावा देना था। इस संगठन ने जाति व्यवस्था और पुरोहितवाद के खिलाफ आवाज उठाई और सभी धर्मों व वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। यह आंदोलन सामाजिक क्रांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।

फुले ने अपने लेखन के माध्यम से भी समाज को जागरूक किया। उनकी प्रसिद्ध कृति “गुलामगिरी” ने जाति व्यवस्था और सामाजिक अन्याय पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने ‘दलित’ शब्द का प्रयोग उन वर्गों के लिए किया जो सामाजिक संरचना में सबसे अधिक शोषित थे, जो आगे चलकर एक सशक्त सामाजिक पहचान बन गया।

पुणे में 1890 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विचारधारा और संघर्ष आज भी समाज को दिशा देते हैं। उनकी 199वीं जयंती पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है और उनके योगदान को याद किया जा रहा है। महत्मा ज्योतिराव फुले का जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा और समानता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन संभव है। उनकी विरासत आज भी न केवल प्रेरणा देती है, बल्कि समाज को एक अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग भी दिखाती है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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