भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गाथा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिनकी पहचान केवल राजनीतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि शब्दों और विचारों की शक्ति से भी निर्मित हुई। सरोजिनी नायडू उन्हीं विलक्षण हस्तियों में से एक थीं—एक कवयित्री, ओजस्वी वक्ता और निर्भीक राष्ट्रवादी, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी और स्वतंत्र भारत में प्रथम महिला राज्यपाल बनने का इतिहास रचा।



प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि:

13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में एक शिक्षित बंगाली परिवार में जन्मी सरोजिनी नायडू का मूल नाम सरोजिनी चट्टोपाध्याय था। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय निज़ाम कॉलेज के प्राचार्य और एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से विज्ञान में डॉक्टरेट प्राप्त विद्वान थे। उनकी माता बरदा सुंदरी देवी एक संवेदनशील कवयित्री थीं। साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण में पली-बढ़ी सरोजिनी ने मात्र 12 वर्ष की आयु में लेखन प्रारंभ कर दिया। उनकी फ़ारसी रचना ‘मेहर मुनीर’ ने हैदराबाद के निज़ाम को प्रभावित किया और उनकी प्रतिभा को व्यापक पहचान मिली।


विदेशी शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना का उदय:

उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने मद्रास, लंदन और कैम्ब्रिज में अध्ययन किया। ब्रिटेन में रहते हुए वे महिला मताधिकार आंदोलन से जुड़ीं और वहीं उनके भीतर राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हुई। भारत लौटने पर उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई। महात्मा गांधी के स्वराज और सत्याग्रह के सिद्धांतों से प्रभावित होकर वे असहयोग आंदोलन सहित कई आंदोलनों का हिस्सा बनीं।



स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका:

1904 के बाद सरोजिनी नायडू एक लोकप्रिय वक्ता के रूप में उभरीं। 1906 में कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय सामाजिक सम्मेलन में उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों पर जोरदार भाषण दिया। वे मानती थीं कि राष्ट्रनिर्माण में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय है और उनके बिना स्वतंत्रता आंदोलन अधूरा रहेगा।

1911 में बाढ़ राहत कार्यों के लिए उन्हें ‘कैसर-ए-हिंद’ पदक से सम्मानित किया गया, किंतु 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने यह सम्मान लौटा दिया। 1925 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात उन्हें संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जिससे वे स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल बनीं।


साहित्यिक उपलब्धियाँ और ‘भारत की कोकिला’:

राजनीतिक सक्रियता के साथ-साथ उनका साहित्यिक योगदान भी उल्लेखनीय रहा। उनकी कविताएँ भारतीय जीवन, देशभक्ति और मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत थीं। 1912 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध कविता “इन द बाज़ार्स ऑफ हैदराबाद” आज भी साहित्य प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। उनकी काव्य शैली में रंगों, बिंबों और लयात्मकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें “भारत की कोकिला” की उपाधि दी।


सरोजिनी नायडू का जीवन भारतीय इतिहास में महिला सशक्तिकरण और स्वतंत्रता संघर्ष का प्रेरक प्रतीक है। वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थीं, बल्कि वह स्वर थीं जिसने राष्ट्र की चेतना को जगाया। उनकी वाणी ने जनांदोलन को गति दी और उनकी लेखनी ने स्वतंत्रता की आकांक्षा को शब्दों में ढाला।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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