इस्लाम अपनाया तो खत्म होगा जातिगत आरक्षण? धर्मांतरण पर मद्रास हाई कोर्ट ने सुनाया नया फैसला
मद्रास उच्च न्यायालय ने 26 जून 2026 को अहम फैसला सुनाते हुए तमिलनाडु सरकार के 2024 के उस शासनादेश को रद्द कर दिया, जिसमें धर्मांतरण के बाद भी पिछड़ा वर्ग मुस्लिम आरक्षण देने की अनुमति थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस्लाम अपनाने के बाद व्यक्ति अपने पूर्व जातिगत आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

मद्रास उच्च न्यायालय का परिसर
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले निर्णय में स्पष्ट किया है कि इस्लाम धर्म अपनाने के बाद कोई भी व्यक्ति अपने पूर्व हिंदू जातिगत आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (BCM) आरक्षण का लाभ दावा नहीं कर सकता। न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार द्वारा जारी उस शासनादेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया, जिसमें धर्मांतरण के बाद भी कुछ वर्गों को BCM श्रेणी में शामिल करने की अनुमति दी गई थी। यह फैसला 26 जून 2026 को न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन और पी. बी. बालाजी की खंडपीठ द्वारा सुनाया गया।
मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें थूथुकुडी निवासी एक व्यक्ति, जो मूल रूप से परमसिवम नाम से हिंदू समुदाय के सबसे पिछड़े वर्ग से संबंधित था, ने 2015 में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था और बाद में अपना नाम बदलकर सलीम अहमद रख लिया था। धर्मांतरण के बाद वह इस्लामी रीति-रिवाजों का पालन कर रहा था। वर्षों बाद उसने तमिलनाडु सरकार के 2024 के शासनादेश के आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदाय प्रमाणपत्र की मांग की, यह दावा करते हुए कि वह BCM आरक्षण का पात्र है। हालांकि स्थानीय तहसीलदार ने उसके आवेदन को अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद उसने इस निर्णय को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
2024 के तमिलनाडु सरकार के शासनादेश में प्रावधान था कि BC, MBC, SC और DNC समुदायों से आने वाले वे व्यक्ति जो इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेते हैं, उन्हें पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (BCM) श्रेणी में शामिल किया जा सकता है और उन्हें इस श्रेणी के अंतर्गत आरक्षण लाभ प्राप्त हो सकता है। इसके साथ ही उन्हें राज्य की सात BCM उप-श्रेणियों में से किसी एक के अंतर्गत प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति भी दी गई थी।
हालांकि उच्च न्यायालय ने इस शासनादेश को संविधान के विपरीत बताते हुए इसे रद्द कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धर्मांतरण के बाद कोई भी व्यक्ति अपने पूर्व जातिगत आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम का दर्जा प्राप्त नहीं कर सकता और वह केवल मुस्लिम माना जाएगा। अदालत ने टिप्पणी की कि जातिगत पहचान हिंदू सामाजिक संरचना से जुड़ी होती है और धर्मांतरण के बाद यह पहचान कानूनी रूप से स्थानांतरित नहीं की जा सकती।
न्यायालय ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का यह प्रयास कि विभिन्न श्रेणियों जैसे BC, MBC, SC और DNC को धर्मांतरण के बाद BCM के रूप में पुनः वर्गीकृत किया जाए, कानूनी रूप से असंगत और मनमाना है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार की व्यवस्था स्थापित करना सरकार के कार्यक्षेत्र से बाहर है, क्योंकि यह पहले से स्थापित न्यायिक सिद्धांतों और संवैधानिक ढांचे के विपरीत है।
फैसले में पूर्व के न्यायिक निर्णयों का भी उल्लेख किया गया, जिनमें यह सिद्धांत दोहराया गया था कि इस्लाम धर्म अपनाने के बाद जाति आधारित पहचान समाप्त हो जाती है और व्यक्ति पूर्व जातिगत लाभों को आगे नहीं ले जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि कुछ मुस्लिम समुदाय जैसे लब्बाई और रौथर आदि जन्म आधारित सामाजिक पहचान रखते हैं, लेकिन यह पहचान केवल जन्म से प्राप्त होती है, न कि धर्मांतरण के बाद अर्जित की जा सकती है।
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि इस्लाम धर्म मूलतः जातिगत भेदभाव को मान्यता नहीं देता, ऐसे में धर्मांतरण के बाद जातिगत आरक्षण ढांचे को लागू करने का प्रयास संवैधानिक और वैचारिक दोनों स्तरों पर असंगत प्रतीत होता है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की मांग को खारिज करते हुए तमिलनाडु सरकार के 2024 के शासनादेश को निरस्त कर दिया। इस निर्णय के बाद स्पष्ट हो गया है कि धर्मांतरण के आधार पर पूर्व जातिगत आरक्षण अधिकारों को आगे बढ़ाया नहीं जा सकता और BCM प्रमाणपत्र केवल उन्हीं को मिल सकता है जो पहले से परिभाषित समुदाय श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
