केरल हाईकोर्ट ने 2025 में अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी पहली पत्नी के रहते हुए दूसरी शादी के पंजीकरण का प्रयास करता है, तो उसे इस प्रक्रिया में पहली पत्नी की सहमति और सुनवाई अवश्य करानी चाहिए। यह निर्णय मुस्लिम परिवारों में नई जागरूकता और कानून के वरिष्ठतम प्रावधानों की अनिवार्यता को उजागर करता है। कई वर्षों से, मुस्लिम समुदाय में पारंपरिक रूप से यह प्रथा रही है कि पुरुष एक से अधिक विवाह कर सकते हैं। हालांकि, देश का संविधान और विवाह पंजीकरण नियम इस धारणा को स्वीकार नहीं करते हैं कि इस प्रकार की परंपरा को बिना सामाजिक और कानूनी अधिकारों का उचित सम्मान किए लागू किया जाए। 2025 में, केरल हाईकोर्ट ने पहली बार मानवीय अधिकारों, संविधान और धार्मिक नियमों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।


अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई मुस्लिम पुरुष अपनी पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना चाहता है, तो नई शादी का रजिस्ट्रेशन तभी किया जा सकता है जब पहली पत्नी को इसकी पूरी जानकारी दी जाए और उसकी सहमति प्राप्त की जाए। अगर पहली पत्नी इस विवाह का विरोध करती है, तो रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को तत्काल रोक दिया जाना चाहिए और मामला संबंधित सिविल न्यायालय के पास भेजा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कुरान या मुस्लिम पर्सनल लॉ में कहीं भी यह अनुमति नहीं दी गई है कि पहली पत्नी की सहमति के बिना दूसरी शादी का रजिस्ट्रेशन किया जा सके।

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून भारत में मुस्लिमों के व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने वाला एक विशेष कानूनी ढांचा है। यह कानून मुख्यतः विवाह, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार और दान-संपत्ति से जुड़े मामलों को कवर करता है और इसे मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 के तहत लागू किया जाता है। इस अधिनियम के अनुसार, मुस्लिमों के व्यक्तिगत मामले इस्लामी शरिया नियमों के अनुसार सुलझाए जाते हैं। इस कानून के तहत, महिलाओं और पुरुषों के विवाह, तलाक और अन्य पारिवारिक अधिकारों में इस्लामी क़ानून का पालन किया जाता है। हालांकि, इस कानून में बहुविवाह की अनुमति दी गई है, लेकिन हाल के अदालत के फैसलों ने इसे सीमित करते हुए महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर दिया है।


इस निर्णय का मूल उद्देश्य महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों की रक्षा करना है। अदालत ने माना कि यदि पति बिना अनुमति के दूसरी शादी करता है, तो यह पहली पत्नी के अधिकारों का हनन है। इसलिए, रजिस्ट्रार को दूसरी शादी के पंजीकरण से पहले पहली पत्नी की राय लेना अनिवार्य होगा। यदि वह आपत्ति दर्ज कराती है, तो विवाह की वैधता का निर्धारण अदालत द्वारा किया जाएगा। यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को सशक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम है और यह संदेश देता है कि कोई भी धार्मिक या सामाजिक परंपरा संविधान और नागरिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती।


फैसले का समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। पहली बार किसी उच्च न्यायालय ने इस तरह का स्पष्ट निर्देश दिया है कि जब भी कोई मुस्लिम पुरुष दूसरी शादी का इरादा रखता है, उसे उसकी पहली पत्नी की राय सुननी होगी। इससे समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और न्याय का महत्व बढ़ेगा। हालांकि, यह फैसला पारंपरिक मान्यताओं और धार्मिक प्रथाओं को चुनौती देता है। कई जगहों पर सामाजिक जागरूकता और महिलाओं के अधिकारों की समझ अभी कम हैं। केरल हाईकोर्ट का यह निर्णय सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में एक बड़ा कदम है। यह फैसला समाज में महिलाओं के सम्मान, न्याय और समानता के अधिकार को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और देश के संविधान के बीच कभी-कभी टकराव भी होता है, खासकर महिलाओं के अधिकारों और समानता के मुद्दों पर। भारत सरकार द्वारा पारित कुछ कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस्लामी प्रथाओं में सुधार की मांग करते हैं ताकि वे संविधान के समानता और नारी अधिकारों के सिद्धांतों के अनुरूप हों।


Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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