आखिर चिता पर क्यों लेटी आदिवासी महिलाए ? जाने बुंदेलखंड की जल जंगल जमीन की अनकही कहानी
केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में छतरपुर में आदिवासी महिलाओं का 'चिता आंदोलन'। विस्थापन और मुआवजे की मांग को लेकर जल सत्याग्रह और कड़ा प्रदर्शन। पूरी रिपोर्ट।

छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में प्रतीकात्मक चिताओं पर बैठीं आदिवासी महिलाएं
Ken-Betwa Link Project Protest : मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों की पथरीली जमीन पर इन दिनों विकास और अस्तित्व के बीच एक ऐसा महासंग्राम छिड़ा है, जिसने देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जहाँ एक ओर सरकार केन-बेतवा लिंक परियोजना (केबीएलपी) को बुंदेलखंड की प्यास बुझाने वाली 'भगीरथ योजना' बता रही है, वहीं दूसरी ओर अपनी पैतृक भूमि और जंगलों से बेदखल होने के डर से हजारों आदिवासी महिलाओं ने 'चिता आंदोलन' के जरिए एक ऐसी आग सुलगा दी है, जिसे बुझाना प्रशासन के लिए चुनौती बन गया है। इस विरोध प्रदर्शन की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आंदोलनकारी महिलाओं ने प्रतीकात्मक चिताएं सजाकर यह ऐलान कर दिया है कि उनकी जमीन का जलमग्न होना उनके लिए किसी मृत्युदंड से कम नहीं है।
अंधेरे और अनिश्चित भविष्य के साये में, छतरपुर के दाउधन बांध निर्माण स्थल के पास विरोध की यह तस्वीर बेहद मर्मस्पर्शी है। गोद में मासूम शिशुओं को लिए आदिवासी महिलाएं उन चिताओं पर बैठी हैं, जो विकास की वेदी पर उनकी बलि चढ़ने का संकेत दे रही हैं। 'पंचतत्व सत्याग्रह' के नाम से चर्चित इस आंदोलन में 'जल सत्याग्रह' और 'चूल्हा बंद' जैसे कड़े कदम उठाए गए हैं। केन नदी के ठंडे पानी में कमर तक डूबी ये महिलाएं केवल मुआवजे की मांग नहीं कर रही हैं, बल्कि वे अपनी उस साझी विरासत, जंगल और संस्कृति को बचाने की गुहार लगा रही हैं, जो बांध की अथाह गहराई में विलीन होने वाली है। उनकी स्पष्ट मांग है कि उन्हें नकदी के बदले "भूमि-के-बदले-भूमि" दी जाए, क्योंकि उनके लिए मिट्टी केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पहचान है।
लगभग 44,000 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना की राह में कानूनी और पर्यावरणीय अड़चनों का अंबार लगा हुआ है। प्रदर्शनकारियों और जय किसान आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने प्रशासन पर दमनकारी रुख अपनाने का गंभीर आरोप लगाया है। दावा है कि आंदोलन स्थल पर भोजन और पानी की आपूर्ति रोकने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू की गई है। इस संघर्ष के केंद्र में केवल विस्थापन ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र की तबाही भी है। पन्ना टाइगर रिजर्व का एक बड़ा हिस्सा डूबने से बाघों, गिद्धों और घड़ियालों का आशियाना उजड़ जाएगा। अनुमान है कि करीब 20 लाख पेड़ों की बलि दी जाएगी, जिससे स्थानीय जलवायु पर अपूरणीय प्रभाव पड़ेगा। आदिवासी समुदाय का तर्क है कि यह परियोजना पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA) और वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत मिलने वाले उनके संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए, 16 अप्रैल 2026 को जिला प्रशासन द्वारा हर प्रभावित गांव में नए सिरे से 'डोर-टू-डोर' सर्वे के आश्वासन के बाद आंदोलन को फिलहाल 10 दिनों के लिए स्थगित किया गया है। हालांकि, यह विराम स्थायी शांति नहीं बल्कि एक गहरे सन्नाटे की तरह है। यदि केन-बेतवा लिंक परियोजना को अपनी मंजिल तक पहुंचना है, तो उसे सिंचाई और पेयजल के दावों के साथ-साथ उन हजारों परिवारों के आंसू और उनकी आजीविका के बीच एक मानवीय संतुलन बनाना होगा। यह संघर्ष महज एक बांध का विरोध नहीं है, बल्कि आधुनिक विकास के उस मॉडल पर सवाल है जो इंसानी गरिमा और पर्यावरणीय नैतिकता को हाशिए पर धकेल देता है। आने वाले दिन तय करेंगे कि बुंदेलखंड के कंठ की प्यास बुझेगी या वहां की मूल संस्कृति अपनी ही राख में दफन हो जाएगी।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
