कर्नाटक में प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स के लिए बनाए गए नए सामाजिक सुरक्षा कानून को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्विगी, ज़ेप्टो, इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) सहित कई प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों ने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस कानून को चुनौती दी है। कंपनियों का कहना है कि यह कानून उनके व्यवसाय पर अनावश्यक और असंवैधानिक बोझ डालता है।

यह पूरा मामला कर्नाटक प्लेटफॉर्म-बेस्ड गिग वर्कर्स (सोशल सिक्योरिटी एंड वेलफेयर) एक्ट, 2025 से जुड़ा है, जिसे राज्य सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया था। इस कानून के तहत एक वेलफेयर बोर्ड और वेलफेयर फंड बनाने का प्रावधान किया गया है, जिसका उद्देश्य डिलीवरी पार्टनर्स, ड्राइवरों और अन्य गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है।

याचिका दायर करने वाली कंपनियों का कहना है कि वे इस कानून को पूरी तरह रद्द करने, इससे जुड़े नियमों को निरस्त करने और सरकार द्वारा जारी अनुपालन नोटिसों को वापस लेने की मांग कर रही हैं। उनके अनुसार यह कानून केंद्र सरकार के सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 से टकराव में है और इस तरह यह संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत असंगतता (repugnancy) पैदा करता है।

कंपनियों ने तर्क दिया है कि श्रम कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और राज्य सरकार ने अपनी सीमा से बाहर जाकर यह कानून बनाया है। इसके अलावा, कंपनियों ने यह भी कहा है कि प्रस्तावित 1 से 5 प्रतिशत तक का वेलफेयर शुल्क उनके परिचालन लागत को बढ़ा देगा, जिससे न केवल व्यवसाय प्रभावित होगा बल्कि गिग वर्कर्स की आय और रोजगार के अवसरों पर भी असर पड़ सकता है। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि कंपनियों को गिग वर्कर्स का विस्तृत डेटा साझा करने, उनकी कमाई और कार्य इतिहास की रिपोर्ट देने तथा आंतरिक विवाद समाधान समितियों (IDRC) का गठन करने जैसे कई अतिरिक्त दायित्व दिए गए हैं, जो उनके व्यावसायिक गोपनीयता और परिचालन स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं।

वहीं दूसरी ओर, कर्नाटक सरकार का मानना है कि गिग वर्कर्स लंबे समय से असंगठित और असुरक्षित श्रम व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं, और इस कानून के जरिए उन्हें दुर्घटना बीमा, सामाजिक सुरक्षा और एक संगठित शिकायत निवारण प्रणाली जैसी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। सरकार का उद्देश्य प्लेटफॉर्म कंपनियों की भूमिका को अधिक जवाबदेह बनाना और श्रमिकों के लिए एक स्थायी सुरक्षा ढांचा तैयार करना है।

यह मामला भारत के गिग इकोनॉमी सेक्टर के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अगर यह कानून लागू रहता है तो देश में डिलीवरी, राइड-हेलिंग और क्विक कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में कार्यरत लाखों गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा का एक नया ढांचा तैयार हो सकता है, जबकि कंपनियों के लिए नियामक और वित्तीय चुनौतियां बढ़ सकती हैं। अभी यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट में विचाराधीन है और इस पर अंतिम निर्णय आना बाकी है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भारत में गिग वर्कर्स के भविष्य और डिजिटल प्लेटफॉर्म उद्योग की दिशा दोनों को गहराई से प्रभावित कर सकता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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