13 अप्रैल 1919: यह तारीख भारतीय इतिहास में एक ऐसे घाव की तरह दर्ज है, जो समय के साथ भले ही पुराना हो गया हो, लेकिन उसकी पीड़ा आज भी उतनी ही गहरी है। 13 अप्रैल 2026 को इस भयावह घटना को 107 वर्ष पूरे हो चुके हैं। जलियांवाला बाग नरसंहार केवल एक हिंसक घटना नहीं थी, बल्कि वह मोड़ था जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की दिशा और तीव्रता दोनों को बदल दिया।

उस समय भारत प्रथम विश्व युद्ध के प्रभाव, आर्थिक संकट, भारी करों, 1918 की महामारी और राजनीतिक असंतोष से जूझ रहा था। ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित रोलेट एक्ट ने बिना मुकदमे के गिरफ्तारी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर कठोर प्रतिबंध लगाए, जिससे पूरे देश में विरोध भड़क उठा। महात्मा गांधी के नेतृत्व में विरोध आंदोलनों ने तेजी पकड़ी, जबकि मुहम्मद अली जिन्ना ने इस कानून के विरोध में अपनी विधायी सीट से इस्तीफा दे दिया।



पंजाब में स्थिति विशेष रूप से तनावपूर्ण थी। माइकल ओ’ड्वायर, जो उस समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे, ने इसे संभावित विद्रोह के संकेत के रूप में देखा। 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में सैफुद्दीन किचलू और सत्यपाल की गिरफ्तारी के विरोध में प्रदर्शन हुआ, जो हिंसक झड़पों में बदल गया। सरकारी इमारतों को आग लगाई गई, कुछ अंग्रेजों की हत्या हुई और एक अंग्रेज महिला मिशनरी पर हमला किया गया।

इन घटनाओं के बाद शहर में मार्शल लॉ जैसे हालात लागू कर दिए गए। सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन यह सूचना व्यापक रूप से लोगों तक नहीं पहुंच सकी। 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन, हजारों लोग जिनमें किसान, व्यापारी, महिलाएं और बच्चे शामिल थे जलियांवाला बाग में एकत्र हुए। कुछ लोग विरोध सभा के लिए आए थे, जबकि कई केवल मेले के कारण वहां पहुंचे थे।

उसी शाम लगभग 5:30 बजे, ब्रिटिश अधिकारी रेजिनाल्ड डायर 50 सैनिकों के साथ बाग में पहुंचे। सैनिकों में गुरखा और सिख रेजिमेंट के जवान शामिल थे। बाग चारों ओर से दीवारों से घिरा था और वहां से निकलने के लिए केवल संकरे रास्ते थे। डायर ने बिना किसी चेतावनी के मुख्य निकास को घेर लिया और सैनिकों को भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया।

लगभग 10 मिनट तक चली इस फायरिंग में 1,650 गोलियां चलाई गईं। सैनिकों ने भीड़ के सबसे घने हिस्सों और निकास की ओर भाग रहे लोगों को निशाना बनाया। लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे, कई कुचलकर मारे गए और कई ने बाग के कुएं में कूदकर अपनी जान बचाने की कोशिश की, जहां से बाद में 120 शव निकाले गए।

मृतकों की संख्या को लेकर मतभेद रहे। ब्रिटिश सरकार ने 379 मौतों का आंकड़ा दिया, जबकि अन्य अनुमानों में यह संख्या 1,000 से 1,500 तक बताई गई। मदन मोहन मालवीय और अन्य भारतीय नेताओं ने अधिक संख्या का अनुमान लगाया। घायलों की संख्या 1,200 से अधिक थी, जिनमें कई गंभीर रूप से घायल थे। कर्फ्यू के कारण घायलों को तत्काल चिकित्सा नहीं मिल सकी, जिससे कई लोगों की रातभर में मौत हो गई।

इस घटना के बाद पूरे देश में गहरा आक्रोश फैल गया। लोगों का ब्रिटिश शासन से विश्वास पूरी तरह टूट गया। विंस्टन चर्चिल ने इस घटना को “अत्यंत भयावह” बताया, और ब्रिटिश संसद में इसकी कड़ी निंदा हुई। इसके बावजूद, ब्रिटेन ने कभी औपचारिक माफी नहीं मांगी, केवल 2019 में “गहरा खेद” व्यक्त किया गया।

इस नरसंहार के बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने विरोध स्वरूप अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी। यह घटना असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि बनी, जिसने 1920–22 के बीच स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। घटना की जांच के लिए हंटर आयोग का गठन किया गया। आयोग ने डायर की कार्रवाई को “गंभीर त्रुटि” और “अमानवीय” करार दिया, लेकिन उसे कानूनी सजा नहीं दी गई। हालांकि, उसे पद से हटा दिया गया और आगे की सेवा से वंचित कर दिया गया।

नरसंहार के बाद पंजाब में और भी दमनात्मक कार्रवाइयां हुईं, जिनमें लोगों को अपमानजनक दंड दिए गए और कई गिरफ्तारियां हुईं। इस घटना का प्रभाव इतना गहरा था कि वर्षों बाद, 1940 में ऊधम सिंह ने लंदन में माइकल ओ’ड्वायर की हत्या कर इसका प्रतिशोध लिया। जलियांवाला बाग नरसंहार केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि वह चेतावनी है जो सत्ता के दुरुपयोग, नागरिक अधिकारों और न्याय की आवश्यकता को याद दिलाती है। 107 वर्ष बाद भी यह घटना भारतीय चेतना में जीवित है और स्वतंत्रता के लिए दिए गए बलिदानों की अमर गाथा सुनाती है।

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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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