इंदिरा जयसिंह भारत की जानी-मानी मानवाधिकार अधिवक्ता और देश की पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में वह वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करती हैं। 1981 में उन्होंने अपने पति आनंद ग्रोवर के साथ मिलकर "लॉयर्स कलेक्टिव" नामक गैर-सरकारी संगठन (NGO) की स्थापना की, जो विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों के लिए कार्य करता है। इंदिरा जयसिंह 2009 में भारत की पहली महिला अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त हुईं। इससे पहले, 1986 में वह बॉम्बे हाई कोर्ट की पहली महिला वरिष्ठ अधिवक्ता बनी थीं।


2020 में इंदिरा को सोशल मीडिया पर उनके एक बयान के लिए बहुत ट्रोल किया गया था, जिसमें उन्होंने निर्भया केस पर अपना एक सुझाव दिया। दरअसल, उन्होंने ट्वीट करते हुए निर्भया की माँ को सलाह की वे चारों आरोपियों को माफ़ी देदें। जिस्ले लिए उन्हें जमकर लताड़ा गया था और निर्भया की माँ ने उनके बयान पर आपत्ति जताई थी। इंदिरा जयसिंह 2025 में दुबारा से चर्चा का विषय बन चुकी हैं। POCSO एक्ट पर उनके एक नए सुझाव ने लोगों को बहुत निराश किया है और सब सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना कर रहे हैं।


असल में, इंदिरा POCSO अधिनियम में सहमति की उम्र 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने का प्रस्ताव लेकर आई हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को सुझाव दिया है कि कानून में 'क्लोज-इन-एज एक्सेप्शन' (आयु के निकट अपवाद) जोड़ा जाए, ताकि 16 से 18 वर्ष के किशोरों के बीच सहमति से बने यौन संबंधों को अपराध न माना जाए। वे कहती हैं कि कानून को सहमति और शोषण के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए ताकि वास्तविक शोषण के मामलों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके और किशोर प्रेम संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा जाए। इंदिरा का तर्क है कि वर्तमान कानून किशोरों की यौन स्वायत्तता का उल्लंघन करता है और इन मामलों में दंडात्मक कार्यवाही अनुचित है।


ब्रिटेन के गिलिक मामले और भारत के पुट्टस्वामी निजता अधिकार के फैसलों का हवाला देते हुए, इंदिरा का कहना है कि निर्णय लेने की स्वतंत्रता, निजता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है, और यह अधिकार किशोरों को भी प्राप्त होना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि 2013 में सहमति की उम्र 16 से 18 वर्ष करने का निर्णय बिना वैज्ञानिक या सामाजिक आधार के लिया गया था। इसके परिणामस्वरूप 16 से 18 वर्ष के किशोरों के मामले POCSO के तहत बढ़े हैं, जिनमें कई मामले पारिवारिक या सामाजिक असहमति के कारण कानूनी संकट में तब्दील हो जाते हैं।


जयसिंग का कहना है कि इस 'क्लोज-इन-एज एक्सेप्शन' के लागू होने से ऐसे मामलों में दंडात्मक शिकंजा कम होगा जहाँ किशोर आपसी सहमति से जुड़े हों। इससे न केवल अदालतों और परिवारों का बोझ कम होगा बल्कि किशोरों को उनके निर्णय लेने के अधिकार और निजता की सुरक्षा भी मिलेगी। उनका यह प्रस्ताव किशोरों के मानवाधिकारों और यौन जागरूकता की वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए लाया गया है।


इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है और केंद्र सरकार इस प्रस्ताव का विरोध करती है, यह कहते हुए कि इससे बाल संरक्षण कमजोर पड़ सकता है। परन्तु जयसिंग और कुछ न्यायिक अभिप्रेतों का मानना है कि कानून में संशोधन से वास्तविक संरक्षण सुनिश्चित करने के साथ-साथ किशोरों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान भी होगा। इस बहस ने भारत में किशोर यौन अधिकारों, पारिवारिक संरचनाओं और कानूनी सुरक्षा के संतुलन पर बड़ा इम्पैक्ट डाला है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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