भारत, जिसे दुनिया में आमों का सबसे बड़ा उत्पादक माना जाता है, आज एक दिलचस्प आर्थिक और सांस्कृतिक परिघटना के केंद्र में है। देश में हर साल उत्पादित होने वाले कुल वैश्विक आमों का लगभग 45 से 50 प्रतिशत हिस्सा यहीं पैदा होता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसका अधिकांश भाग अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच ही नहीं पाता। इसके पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं, बल्कि 1.4 अरब लोगों की विशाल मांग और आम के प्रति गहरा भावनात्मक जुड़ाव भी है।



वर्ष 2025 में भारत का आम बाजार लगभग 2.9 अरब डॉलर, यानी करीब 24,000 करोड़ रुपये का आंका गया है। वहीं, अनौपचारिक और स्थानीय व्यापार को शामिल करने पर यह आंकड़ा 40,000 करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच जाता है। इस तरह कुल मिलाकर देश का आम कारोबार 25,000 से 40,000 करोड़ रुपये के बीच माना जा रहा है। इस विशाल बाजार का सबसे बड़ा हिस्सा घरेलू खपत से आता है, जहां देश की बड़ी आबादी खुद ही उत्पादित आमों का अधिकांश उपभोग कर लेती है।

भारत में आम केवल एक फल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक है। गर्मियों का मौसम आते ही इसकी मांग चरम पर पहुंच जाती है। आम का उपयोग न केवल ताजे फल के रूप में, बल्कि अचार, जूस, मिठाइयों और विभिन्न व्यंजनों में भी व्यापक रूप से होता है। यही कारण है कि स्थानीय बाजार में इसकी बिक्री अधिक आसान और लाभदायक मानी जाती है, जबकि निर्यात के लिए सख्त गुणवत्ता मानकों, उच्च लागत और जटिल लॉजिस्टिक्स जैसी चुनौतियां सामने आती हैं।



निर्यात के मोर्चे पर भारत की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। ताजे आमों का निर्यात सालाना लगभग 56 से 60 मिलियन डॉलर, यानी करीब 450 से 500 करोड़ रुपये के आसपास रहता है। हालांकि, प्रोसेस्ड उत्पादों जैसे आम के गूदे और अन्य उत्पादों के माध्यम से यह आंकड़ा बढ़कर कुल मिलाकर लगभग 3,500 करोड़ रुपये तक पहुंचता है। देश में हर साल करीब 3.5 लाख टन आम का गूदा तैयार किया जाता है, जो पेय पदार्थों, मिठाइयों और एफएमसीजी उत्पादों में इस्तेमाल होता है और बाजार मूल्य में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

इसके बावजूद, भारत का अधिकांश आम उत्पादन देश के भीतर ही खपत हो जाता है। इसकी एक प्रमुख वजह आम का नाजुक और जल्दी खराब होने वाला स्वभाव है, जो अंतरराष्ट्रीय परिवहन को कठिन बना देता है। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर बिक्री में कम जोखिम और बेहतर मुनाफा भी किसानों और व्यापारियों को निर्यात के बजाय घरेलू बाजार को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करता है।

इस विषय ने सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। कई भारतीय उपयोगकर्ताओं ने इस तथ्य पर गर्व और हास्य के साथ प्रतिक्रिया दी, यह कहते हुए कि देश के लोग अपने आम खुद खाना पसंद करते हैं। कुछ ने यहां तक कहा कि आम इतने स्वादिष्ट हैं कि उन्हें साझा करने का सवाल ही नहीं उठता। वहीं, अंतरराष्ट्रीय उपयोगकर्ताओं ने इस स्थिति पर आश्चर्य व्यक्त किया, लेकिन कई ने इसे भारत की विशाल जनसंख्या और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के संदर्भ में समझा।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर आम की मिठास और खुशियों को लेकर हो रही चर्चा

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) और रेडिट पर यह चर्चा एक हल्के-फुल्के सांस्कृतिक क्षण में बदल गई, जहां उपयोगकर्ताओं ने मजाकिया और भावनात्मक टिप्पणियों के माध्यम से आम के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया। कुछ प्रतिक्रियाओं में यह भी कहा गया कि “पैसा खुशी नहीं देता, लेकिन आम जरूर देते हैं।” कई भारतीयों ने यह भी साझा किया कि वे हर साल आम के मौसम का बेसब्री से इंतजार करते हैं और बड़ी मात्रा में इसका सेवन करते हैं।

अंततः, यह परिघटना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान, उपभोक्ता व्यवहार और बाजार संरचना का प्रतीक बन गई है। वैश्विक व्यापार के दौर में भी भारत का आम अपने ही लोगों के बीच सबसे अधिक प्रिय बना हुआ है, जो यह दर्शाता है कि कुछ चीजें केवल बाजार नहीं, बल्कि भावनाओं से भी संचालित होती हैं।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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