वैश्विक स्तर पर 85वें स्थान पर भारत, कूटनीतिक ताकत की नई परीक्षा : क्यों पीछे रह गया भारतीय पासपोर्ट
2025 के हेनली एंड पार्टनर्स पासपोर्ट इंडेक्स में भारत 85वें स्थान पर पहुंच गया है। भारतीय नागरिकों को केवल 57 देशों में वीजा-फ्री या वीजा-ऑन-एराइवल सुविधा मिलती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय यात्रा जटिल, महंगी और समयसाध्य बन जाती है।

इंडियन पासपोर्ट
2025 के हेनली एंड पार्टनर्स पासपोर्ट इंडेक्स के अनुसार, भारत का पासपोर्ट 199 देशों में से 85वें स्थान पर है। भारतीय नागरिकों को केवल 57 देशों में वीजा-फ्री या वीजा-ऑन-एराइवल की सुविधा प्राप्त है। दूसरी ओर, सिंगापुर इस सूची में शीर्ष पर है, जिसके नागरिक लगभग 195 देशों में बिना वीजा यात्रा कर सकते हैं। यह अंतर यह दर्शाता है कि यात्रा की स्वतंत्रता के मामले में भारतीय पासपोर्ट अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में है। भारतीय पासपोर्ट की यह स्थिति केवल संख्यात्मक तुलना भर नहीं, बल्कि यह भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आर्थिक प्रभाव को भी इंगित करती है।
पासपोर्ट रैंकिंग इस बात पर निर्भर करती है कि किसी देश के नागरिक कितने देशों में बिना वीजा या वीजा-ऑन-एराइवल की सुविधा पा सकते हैं। जो देश अधिक कूटनीतिक या आर्थिक प्रभाव रखते हैं, वे अन्य देशों से अधिक ऐसे समझौते कर पाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत की पासपोर्ट रैंकिंग में स्पष्ट गिरावट देखी गई है। 2024 में भारत 80वें स्थान पर था जबकि 2025 में यह पाँच पायदान नीचे जाकर 85वें पर पहुँच गया। इस गिरावट के कई कारण हैं। एक प्रमुख कारण है कि भारत ने हाल के वर्षों में सीमित संख्या में देशों के साथ यात्रा संबंधी द्विपक्षीय समझौते किए हैं। दूसरी ओर, कई एशियाई और यूरोपीय देशों ने अपने नागरिकों के लिए नई वीजा-मुक्त समझौतियाँ की हैं, जिससे उनकी रैंकिंग में सुधार हुआ है।
भारत की तुलना में जापान, जर्मनी, इटली और दक्षिण कोरिया के नागरिक 190 से अधिक देशों में बिना वीजा यात्रा कर सकते हैं। इन देशों की मजबूत अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रभाव और व्यापक द्विपक्षीय नेटवर्क उनके पासपोर्ट को शक्तिशाली बनाते हैं। इसके विपरीत, भारत जैसे देशों को अपने नागरिकों की अंतरराष्ट्रीय यात्रा की स्वतंत्रता बढ़ाने के लिए अधिक सक्रिय कूटनीतिक प्रयास करने की आवश्यकता है। भारत दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है और हर साल करोड़ों भारतीय विदेश यात्रा करते हैं।
ऐसे में, पासपोर्ट की रैंकिंग केवल व्यक्तिगत सुविधा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह देश की अंतरराष्ट्रीय छवि और वैश्विक संबंधों पर भी असर डालती है। मजबूत पासपोर्ट वाले देशों को व्यापार, निवेश, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अधिक अवसर मिलते हैं। भारतीय नागरिकों के लिए यह स्थिति व्यावहारिक चुनौतियाँ भी पैदा करती है। विदेश में पढ़ाई, काम या पर्यटन के उद्देश्य से यात्रा करने वाले लोगों को वीजा प्रक्रिया में अधिक समय, दस्तावेज़ी औपचारिकताएँ और खर्च झेलने पड़ते हैं। कई देशों में सुरक्षा और प्रवासन नीति कड़ी होने के कारण भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसके अलावा, पर्यटन उद्योग पर भी इसका असर पड़ता है, क्योंकि भारतीय यात्रियों के लिए सहज यात्रा के विकल्प सीमित हैं।
इस स्थिति को सुधारने के लिए भारत को कुछ रणनीतिक कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, उसे अपने पड़ोसी देशों और महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदारों के साथ अधिक वीजा-फ्री या वीजा-ऑन-एराइवल समझौते करने चाहिए। दूसरा, भारत को अपने नागरिकों के पासपोर्ट और वीजा आवेदनों में पारदर्शिता, सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करनी होगी ताकि अन्य देश भारतीय यात्रियों पर अधिक भरोसा कर सकें। तीसरा, डिजिटल पासपोर्ट और बायोमेट्रिक सुरक्षा प्रणालियों को मजबूत बनाना आवश्यक है ताकि भारत की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक सुरक्षित और संगठित हो सके।
इसके अतिरिक्त, भारतीय विदेश नीति को इस दिशा में और सक्रिय प्रयास करने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, और कनाडा जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय यात्रा समझौतों को लेकर नए सिरे से वार्ता आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती राजनीतिक और आर्थिक भूमिका का लाभ उठाकर अपने नागरिकों को अधिक यात्रा स्वतंत्रता दिलाना दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
