भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहाँ मानसून की एक-एक बूंद अर्थव्यवस्था की दिशा तय करती है, वहाँ भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) केवल एक सरकारी कार्यालय नहीं बल्कि राष्ट्र की जीवनरेखा के रूप में कार्य करता है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन यह प्रमुख एजेंसी मौसम संबंधी टिप्पणियों, पूर्वानुमान और भूकंप विज्ञान के लिए उत्तरदायी है। आज के समय में जब जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां वैश्विक स्तर पर बढ़ रही हैं, तब आईएमडी की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। यह विभाग न केवल देश के भीतर मौसम की भविष्यवाणी करता है, बल्कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन के छह क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्रों में से एक के रूप में उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र, जिसमें बंगाल की खाड़ी और अरब सागर शामिल हैं, में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के नामकरण और उनकी चेतावनी जारी करने का अंतरराष्ट्रीय दायित्व भी निभाता है।

इस संस्थान की महत्ता को समझने के लिए हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटना होगा जब भारत प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील था। मौसम विज्ञान के अध्ययन की नींव 1686 में एडमंड हैली के मानसून संबंधी शोध से पड़ी थी, लेकिन औपचारिक वेधशालाओं की स्थापना 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा की गई। वर्ष 1864 में कलकत्ता में आए भीषण चक्रवात और उसके बाद 1866 व 1873 के विनाशकारी अकाल ने ब्रिटिश प्रशासन को झकझोर कर रख दिया। मानसून की विफलता के कारण हुई इन त्रासदियों के बाद ही यह निर्णय लिया गया कि मौसम संबंधी डेटा का संग्रह और विश्लेषण एक ही छत के नीचे होना चाहिए। फलस्वरूप, 15 जनवरी 1875 को भारत मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना हुई, जिसमें हेनरी फ्रांसिस ब्लैनफोर्ड को पहले 'मेट्रोलॉजिकल रिपोर्टर' के रूप में नियुक्त किया गया।

समय के साथ आईएमडी का विकास और विस्तार निरंतर होता रहा। वर्ष 1889 में सर जॉन इलियट विभाग के पहले महानिदेशक बने और इसका मुख्यालय कलकत्ता से शिमला (1905), फिर पुणे (1928) और अंततः 1944 में नई दिल्ली स्थानांतरित किया गया। स्वतंत्रता के पश्चात 1949 में यह विश्व मौसम विज्ञान संगठन का सदस्य बना और भारतीय कृषि में मानसून की अहमियत को देखते हुए इसने अपनी पूर्वानुमान तकनीकों को अत्याधुनिक बनाना शुरू किया। आज इस विभाग का नेतृत्व महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र कर रहे हैं, जिन्हें अक्सर 'साइक्लोन मैन ऑफ इंडिया' भी कहा जाता है। विभाग का ढांचा अत्यंत सुदृढ़ है, जिसमें चेन्नई, मुंबई, कोलकाता, नागपुर, गुवाहाटी और नई दिल्ली में स्थित छह क्षेत्रीय केंद्रों के साथ-साथ प्रत्येक राज्य की राजधानी में एक मौसम विज्ञान केंद्र कार्यरत है।

तकनीकी रूप से आईएमडी आज दुनिया के अग्रणी मौसम संस्थानों में खड़ा है। यह सतह और हिमनद वेधशालाओं, उच्च ऊंचाई वाले स्टेशनों और ओजोन निगरानी केंद्रों का एक विशाल नेटवर्क संचालित करता है। इसरो के सहयोग से आईएमडी 'कल्पना-1', 'मेघा-ट्रॉपिक्स' और इनसैट (INSAT) श्रृंखला के उपग्रहों का उपयोग करके मौसम की निगरानी करता है। उल्लेखनीय है कि विकासशील देशों में भारत पहला ऐसा देश था जिसने अपना स्वयं का उपग्रह आधारित मौसम निगरानी तंत्र विकसित किया। इसके अलावा, विभाग भारतीय नौसेना और मर्चेंट नेवी के जहाजों से भी डेटा प्राप्त करता है, जिससे समुद्री मौसम और चक्रवातों की सटीक भविष्यवाणी संभव हो पाती है।

भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए विभाग लगातार नवाचार कर रहा है। वर्ष 2016 में 'सिस्टम ऑफ एयरोसोल मॉनिटरिंग एंड रिसर्च' (SAMAR) की शुरुआत की गई ताकि ब्लैक कार्बन और एयरोसोल के जलवायु प्रभावों का अध्ययन किया जा सके। कृषि-मौसम विज्ञान सलाहकार सेवा केंद्रों और बाढ़ मौसम विज्ञान कार्यालयों के माध्यम से यह सीधे तौर पर किसानों और आम जनता को आपदाओं के प्रति सचेत करता है। चक्रवातों की समय पर चेतावनी देकर हजारों लोगों की जान बचाना और भूकंपीय गतिविधियों की निरंतर निगरानी करना इस संस्थान की उस अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो इसे आधुनिक भारत के निर्माण में एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है।

Pratahkal HQ

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