भारत के सामाजिक और शैक्षिक इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपने साहस, दूरदृष्टि और संघर्ष से समाज की दिशा बदल दी। ऐसी ही महान विभूति थीं सावित्रीबाई फुले, जिन्हें आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षिका, प्रखर समाज सुधारक और कवयित्री के रूप में जाना जाता है। 10 मार्च 1897 को उनका निधन हुआ था, और इस वर्ष उनकी 129वीं पुण्यतिथि पर देशभर में उन्हें याद किया जा रहा है। महिलाओं की शिक्षा, सामाजिक समानता और जातिगत भेदभाव के खिलाफ उनका संघर्ष भारतीय समाज सुधार आंदोलन की एक महत्वपूर्ण धारा बन गया।


शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत:

19वीं सदी का भारत महिलाओं की शिक्षा के लिए लगभग बंद दरवाजों वाला समाज था। ऐसे समय में सावित्रीबाई फुले ने परंपराओं को चुनौती देते हुए शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। विवाह के समय वे स्वयं निरक्षर थीं, लेकिन उनके पति ज्योतिबा फुले और उनकी मार्गदर्शक सगुनाबाई शिरसागर ने उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया। खेतों में काम करते हुए ही उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की और आगे चलकर औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए अहमदनगर में अमेरिकी मिशनरी सिंथिया फरार द्वारा संचालित शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने पुणे के नॉर्मल स्कूल से भी शिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस तरह वे भारत की पहली प्रशिक्षित महिला शिक्षिका और पहली महिला प्रधानाध्यापिका बनीं।



भारत का पहला लड़कियों का स्कूल:

1848 में सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र के पुणे में तात्यासाहेब भिड़े के घर ‘भिड़े वाड़ा’ में लड़कियों के लिए पहला स्कूल शुरू किया। उस दौर में यह कदम अत्यंत क्रांतिकारी था। समाज के रूढ़िवादी वर्ग ने इस पहल का कड़ा विरोध किया, लेकिन सावित्रीबाई ने अपने संकल्प को नहीं छोड़ा। 1851 तक दोनों ने मिलकर पुणे में लड़कियों के तीन स्कूल स्थापित किए, जिनमें लगभग 150 छात्राएँ पढ़ती थीं।


उस समय सरकारी स्कूलों की तुलना में इन स्कूलों की शिक्षण पद्धति अधिक प्रभावी मानी जाती थी। परिणामस्वरूप, इन स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लड़कों से भी अधिक हो गई। सावित्रीबाई फुले ने केवल शिक्षा तक ही अपने कार्यों को सीमित नहीं रखा, बल्कि महिलाओं और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए कई महत्वपूर्ण पहल कीं।

उनके प्रमुख सामाजिक कार्यों में शामिल हैं:

  • 1851: महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए “महिला सेवा मंडल” की स्थापना
  • 1853: विधवाओं के लिए “बालहत्या प्रतिबंधक गृह” की स्थापना, जहाँ अनचाहे शिशुओं की हत्या को रोकने के प्रयास किए गए
  • 1873: सत्यशोधक समाज की स्थापना में सहयोग और इसके महिला विभाग का नेतृत्व

उनका उद्देश्य समाज से जाति और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना था। सावित्रीबाई फुले ने साहित्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाएँ समाज में शिक्षा और समानता के विचारों को फैलाने का माध्यम बनीं।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं:

  • ‘काव्य फुले’ (1854)
  • ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ (1892)

इन रचनाओं में उन्होंने शिक्षा, सामाजिक न्याय और मानव समानता का संदेश दिया।


सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले की कोई संतान नहीं थी। माना जाता है कि उन्होंने एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र यशवंतराव को गोद लिया। बाद में यशवंत की शादी सावित्रीबाई ने अपने संगठन में काम करने वाले कार्यकर्ता दीनोबा ससाने की बेटी से करवाई। यह कदम भी उस समय सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने वाला था, क्योंकि विधवा के पुत्र को समाज में स्वीकार्यता मिलना आसान नहीं था।


1897 में जब भारत में ब्यूबोनिक प्लेग की महामारी फैली, तो सावित्रीबाई फुले ने अपने दत्तक पुत्र यशवंत के साथ मिलकर पीड़ितों के लिए एक क्लिनिक शुरू किया। यह क्लिनिक पुणे के बाहरी इलाके में स्थापित किया गया था ताकि संक्रमित लोगों का इलाज सुरक्षित रूप से किया जा सके। इसी दौरान उन्हें पता चला कि मुंधवा के पास महार बस्ती में पांडुरंग बाबाजी गायकवाड़ का बेटा प्लेग से संक्रमित हो गया है। सावित्रीबाई तुरंत वहाँ पहुँचीं और बीमार बच्चे को अपनी पीठ पर उठाकर अस्पताल ले आईं। लेकिन इस मानवीय प्रयास के दौरान वे स्वयं संक्रमण की चपेट में आ गईं। 10 मार्च 1897 की रात लगभग 9 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। इस तरह समाज सेवा करते हुए उन्होंने अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया।


सावित्रीबाई फुले का जीवन भारतीय समाज सुधार आंदोलन की एक प्रेरणादायक गाथा है। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली माध्यम बनाया और महिलाओं, दलितों तथा वंचित वर्गों के लिए समान अधिकारों की लड़ाई लड़ी। उनकी 129वीं पुण्यतिथि पर उन्हें केवल एक शिक्षिका या समाज सुधारक के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत में महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय की अग्रदूत के रूप में याद किया जाता है। उनकी विरासत आज भी देश के शिक्षा और सामाजिक सुधार आंदोलनों को दिशा देती है।



Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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