देहरादून, उत्तराखंड में इंटरनेशनल कवान की डो प्रतियोगिता के चयन को लेकर चल रहे विवाद के बीच शायरा ने कहा कि वह मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाईं। उन्होंने बताया कि वह थोड़ी घबरा गई थीं और अपना संयम खो बैठी थीं।

शायरा ने बताया कि जम्मू में आयोजित राष्ट्रीय कवान की डो प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था और इसके बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए उनका चयन हुआ था। उन्हें सीधे 1.5 लाख रुपये की प्रायोजन राशि मिल रही थी, लेकिन यात्रा और सुरक्षा शुल्क जैसे खर्चों के लिए उन्हें 50,000 रुपये स्वयं वहन करने थे।

उन्होंने बताया कि इसके साथ पासपोर्ट को लेकर भी समस्या सामने आई। शायरा के अनुसार, वह 18 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद ही पासपोर्ट के लिए आवेदन कर सकती थीं। एक अन्य विकल्प परिवार के सदस्यों के पासपोर्ट के जरिए आवेदन करना था, लेकिन उनके परिवार के सदस्यों के पास भी पासपोर्ट नहीं थे।

शायरा ने कहा कि 15 दिन बाद जब वह पासपोर्ट कार्यालय गईं तो उन्हें बताया गया कि प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम 20 दिन लगेंगे। इस समय-सीमा के कारण वह निर्धारित समयसीमा चूक जातीं। उन्होंने बताया कि इसी वजह से उन्होंने पासपोर्ट नहीं बनवाया और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने की उनकी संभावना और भी समाप्त हो गई।

शायरा के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए चयनित होने के बावजूद खर्च, पासपोर्ट और समयसीमा से जुड़ी बाधाओं ने उनके सामने विदेश में प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का अवसर कठिन बना दिया।

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