हरियाणा के गुरुग्राम से सामने आया एक मामला देश की प्रजनन चिकित्सा व्यवस्था और IVF प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एक दंपति ने दावा किया है कि IVF प्रक्रिया के जरिए जन्मीं उनकी जुड़वां बेटियां जैविक रूप से उनकी संतान नहीं हैं। DNA जांच की रिपोर्ट सामने आने के बाद यह मामला कानूनी और चिकित्सकीय विवाद में बदल गया है, जिसकी जांच अब पुलिस और न्यायालय की निगरानी में आगे बढ़ रही है।

गुरुग्राम निवासी 41 वर्षीय राहुल राठौर और उनकी 39 वर्षीय पत्नी मीनू राठौर पहले से दो बेटियों के माता-पिता हैं। वर्ष 2024 में उन्होंने परिवार बढ़ाने के उद्देश्य से दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित एक IVF सेंटर में उपचार शुरू कराया। दंपति के अनुसार, IVF प्रक्रिया के तहत अंडाणु और वीर्य के नमूने लिए गए, भ्रूण तैयार किए गए और बाद में मीनू के गर्भाशय में भ्रूण प्रत्यारोपित किया गया।

इलाज सफल रहा और 5 जनवरी 2026 को मीनू ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया। शुरुआत में परिवार ने इस खुशी का जश्न मनाया, लेकिन कुछ ही समय बाद बच्चों की शारीरिक बनावट को लेकर संदेह पैदा होने लगा। दंपति का कहना है कि छोटी जुड़वां बच्ची का चेहरा-मोहरा और शारीरिक विशेषताएं परिवार के किसी भी सदस्य से मेल नहीं खा रही थीं।

राहुल राठौर के अनुसार, बड़ी बच्ची सामान्य लग रही थी, लेकिन छोटी बच्ची में पूर्वोत्तर भारत के लोगों जैसी शारीरिक विशेषताएं दिखाई दे रही थीं। इसी संदेह के आधार पर उन्होंने DNA परीक्षण कराने का फैसला किया। जांच रिपोर्ट ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। दंपति का दावा है कि DNA रिपोर्ट में मातृत्व और पितृत्व दोनों के नमूने नकारात्मक पाए गए, जिससे संकेत मिला कि दोनों बच्चियां जैविक रूप से उनकी संतान नहीं हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि दोनों जुड़वां बच्चियां आपस में भी जैविक रूप से संबंधित नहीं हो सकती हैं।

DNA रिपोर्ट सामने आने के बाद दंपति ने आशंका जताई कि IVF प्रक्रिया के दौरान किसी स्तर पर गंभीर गड़बड़ी हुई हो सकती है। उनके अनुसार, संभव है कि किसी अन्य दंपति का भ्रूण गलती से मीनू के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया गया हो। दूसरी संभावना यह है कि अंडाणु, शुक्राणु या भ्रूण के नमूनों की अदला-बदली हो गई हो। दंपति ने यह आशंका भी जताई कि जन्म के बाद बच्चों की अदला-बदली हुई हो सकती है, हालांकि अब तक जांच एजेंसियों ने ऐसी किसी संभावना की पुष्टि नहीं की है।

इस पूरे मामले का सबसे भावनात्मक पहलू वह सवाल है, जिसे राहुल और मीनू लगातार उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि ये बच्चियां उनकी जैविक संतान नहीं हैं, तो उनके वास्तविक बच्चे आखिर कहां हैं। दंपति का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी अस्पताल या संस्था को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि अपने जैविक बच्चों के बारे में सच्चाई जानना है।

मामला तब और गंभीर हो गया जब दंपति ने आरोप लगाया कि शिकायत देने के बावजूद शुरुआती महीनों में पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। राहुल राठौर के अनुसार, तीन महीने तक उनकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। अंततः न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद 31 मार्च को FIR दर्ज की गई, लेकिन अगले ही दिन जांच प्रक्रिया पर रोक लगने से मामला फिर अटक गया।

कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण मोड़ 5 जून को आया, जब एक सक्षम अदालत ने पुलिस को IVF सेंटर से संबंधित सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज, भ्रूण लॉग शीट, रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्य जब्त करने का आदेश दिया। अदालत का मानना था कि पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए इन दस्तावेजों की जांच आवश्यक है। राहुल राठौर ने भी पुलिस से जल्द से जल्द रिकॉर्ड जब्त करने की अपील करते हुए कहा कि जब तक संबंधित अस्पताल और IVF प्रक्रिया की गहन जांच नहीं होगी, तब तक उनके बच्चों के बारे में सच्चाई सामने नहीं आ सकेगी।

फिलहाल जांच एजेंसियां भ्रूण के भंडारण और स्थानांतरण से जुड़े रिकॉर्ड, प्रयोगशाला की कार्यप्रणाली, मरीजों के दस्तावेज, सहमति पत्रों और DNA साक्ष्यों की जांच की तैयारी कर रही हैं। इस दौरान यह भी देखा जाएगा कि कहीं IVF प्रक्रिया के दौरान किसी प्रकार की मानवीय त्रुटि या प्रशासनिक लापरवाही तो नहीं हुई। यह मामला इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यदि दंपति के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह भारत के IVF इतिहास के सबसे गंभीर मामलों में से एक हो सकता है। इससे प्रजनन चिकित्सा केंद्रों की निगरानी व्यवस्था, भ्रूण प्रबंधन प्रोटोकॉल, रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया और मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मौजूदा नियमों पर व्यापक बहस छिड़ सकती है।


विचारणीय यह भी है की अभी तक किसी भी जांच एजेंसी या सरकारी संगठनो ने भ्रूण की अदला-बदली, नमूनों की गड़बड़ी या किसी प्रकार की लापरवाही की पुष्टि अब तक नहीं की है। पुरे मामले की जांच अभी तक जारी है और किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले रिपोर्ट्स का आना आवश्यक है। हालांकि इस घटना का असर उन परिवारों पर भी हो सकता है जो संतान प्राप्ति के लिए IVF जैसी आधुनिक तकनीकों पर भरोसा करते हैं।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

Next Story