वलसाड जिले के बेरास्ता फलिया गांव में भूजल स्तर गिरने और सरकारी कुएं सूखने के कारण स्थानीय निवासियों को भीषण पेयजल किल्लत का सामना करना पड़ रहा है।

Valsad water crisis Gujarat 2026 : देश के सबसे विकसित राज्यों में शुमार गुजरात के ग्रामीण इलाकों से विकास की दावों को मुंह चिढ़ाती एक बेहद भयावह और विचलित करने वाली जमीनी हकीकत सामने आई है। राज्य के वलसाड जिले में पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचा हुआ है, जहां ग्रामीण अपनी और अपने मासूम बच्चों की प्यास बुझाने के लिए रोजाना मौत के कुएं में उतरने को मजबूर हैं। क्षेत्र में जल संकट इस कदर गहरा गया है कि लोग पानी लाने के लिए ४५ फुट गहरे सूखे कुओं की खतरनाक पथरीली दीवारों पर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के चढ़ते और उतरते हैं। जरा सी चूक का मतलब सीधे मौत है, लेकिन पेट की आग और गले की प्यास ने इन ग्रामीणों को इस जानलेवा जोखिम को रोज गले लगाने पर विवश कर दिया है।

मार्च में होली के बाद ही सूख गए सारे जलस्रोत, बेरास्ता फलिया के 1200 लोग बूंद-बूंद को मोहताज :

वलसाड जिले के अंतर्गत आने वाले बेरास्ता फलिया गांव की स्थिति इस समय सबसे ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है। करीब बारह सौ की आबादी वाले इस इलाके में पानी की आपूर्ति के लिए बनाए गए सभी आठ सरकारी कुएं मार्च के महीने में होली का त्योहार बीतते ही पूरी तरह सूख गए थे। चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी के चलते न केवल कुएं खाली हुए हैं, बल्कि गांव में लगे अधिकांश हैंडपंप और ट्यूबवेल भी भूजल स्तर गिरने के कारण दम तोड़ चुके हैं। पानी के पारंपरिक और आधुनिक दोनों ही स्रोत ठप होने से पूरा गांव पूरी तरह बेबस हो गया है। महिलाएं और बच्चे भीषण लू के बीच दिन का बड़ा हिस्सा पानी की तलाश में बिताते हैं और अंततः उन्हें उन्हीं गहरे कुओं के तल में बचे मटमैले पानी को छानकर निकालना पड़ता है।

अत्यधिक दोहन, लू और ठप पड़ी नदी जोड़ो परियोजना: क्यों पैदा हुआ यह मानवीय संकट

भौगोलिक रूप से वलसाड एक ऐसा क्षेत्र माना जाता है जहां मानसून के दौरान अच्छी बारिश दर्ज की जाती है, लेकिन इसके बावजूद मई के महीने में इस तरह का सूखा पड़ना जल प्रबंधन की गंभीर विफलता को दर्शाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, इस संकट के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं— भूजल का अनियंत्रित और अत्यधिक औद्योगिक व कृषि दोहन, जलवायु परिवर्तन के कारण चलने वाली भीषण लू, और जलभृतों (एक्विफर्स) को फिर से भरने यानी भूजल पुनर्भरण (ग्राउंडवाटर रिचार्जिंग) के लिए किसी ठोस नीति का न होना। इसके अतिरिक्त, इलाके के लिए बनाई गई नदी को आपस में जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी परियोजना वर्षों से लालफीताशाही और प्रशासनिक सुस्ती के कारण अधूरी पड़ी है। सरकारी नलों के जरिए होने वाली पानी की आपूर्ति भी इतनी अनियमित है कि लोगों को हफ्ते में एक बार भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता।

विकास के मॉडल पर उठ रहे गंभीर सवाल, प्रशासन की सुस्ती के बीच मध्य जून तक राहत के आसार नहीं :

स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने इस संकट को लेकर प्रशासन के रवैये पर तीखे सवाल उठाए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के हर नागरिक को स्वच्छ पेयजल मिलना उसका मौलिक अधिकार है, लेकिन धरातल पर नियमों और दावों की धज्जियां उड़ती दिख रही हैं। जिला प्रशासन की ओर से अब तक इस गंभीर मानवीय संकट से निपटने के लिए कोई स्थाई विकल्प जैसे पानी के टैंकरों की सुचारू व्यवस्था या आपातकालीन मरम्मत कार्य शुरू नहीं किया गया है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक, गुजरात में मानसून का आगमन मध्य जून से पहले होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में आने वाले तीन से चार हफ्ते इन ग्रामीणों के लिए किसी बड़े इम्तिहान से कम नहीं होंगे, जहां हर दिन उन्हें पानी के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगाना होगा।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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