भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में गिनी जाने वाली अरावली पहाड़ियाँ आज एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं। राजस्थान से लेकर दिल्ली-एनसीआर और गुजरात तक फैली यह पर्वतमाला केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु, पर्यावरण और जीवन व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। हाल के महीनों में कानूनी व्याख्याओं, स्थानीय स्तर पर वृक्ष कटान की घटनाओं और नियामक हस्तक्षेपों ने अरावली के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अरावली पर्वतमाला का राजस्थान के लिए महत्व असाधारण है। यह क्षेत्र थार मरुस्थल और पूर्वी भारत के बीच एक प्राकृतिक अवरोध की तरह कार्य करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली की उपस्थिति ही राजस्थान के कई हिस्सों को पूर्ण रेगिस्तान बनने से रोकती है। यह पहाड़ियाँ मानसूनी हवाओं को धीमा कर वर्षा को संभव बनाती हैं और भूजल पुनर्भरण में अहम भूमिका निभाती हैं। बाणास, लूणी और साबरमती जैसी नदियों की उत्पत्ति और प्रवाह अरावली से ही जुड़ा हुआ है, जो राज्य के लिए जल सुरक्षा का आधार है।

उत्तर भारत के संदर्भ में अरावली की भूमिका और भी व्यापक हो जाती है। यह पर्वतमाला थार से उठने वाली धूल और गर्म हवाओं को दिल्ली-एनसीआर और गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक पहुंचने से काफी हद तक रोकती है। पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अरावली कमजोर होती है, तो उत्तर भारत में वायु प्रदूषण, तापमान वृद्धि और जल संकट की स्थिति और गंभीर हो सकती है। यही कारण है कि इसे “उत्तर भारत का प्राकृतिक एयर-फिल्टर” भी कहा जाता है।

पर्यावरण संरक्षण के स्तर पर अरावली जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहाँ तेंदुआ, सियार, हिरण, सैकड़ों पक्षी प्रजातियाँ और औषधीय वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इसके जंगल कार्बन अवशोषण, मिट्टी संरक्षण और स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में सहायक हैं। ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की आजीविका भी इन पहाड़ियों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है।

हालांकि, हाल के समय में स्थानीय स्तर पर वृक्ष कटान और भूमि साफ करने की घटनाएँ सामने आई हैं। कुछ क्षेत्रों में अवैध खनन, निर्माण गतिविधियों और भूमि उपयोग परिवर्तन के कारण वनस्पति को नुकसान पहुंचने की रिपोर्ट्स दर्ज की गई हैं। ये घटनाएँ किसी केंद्रीय आदेश का परिणाम नहीं हैं, लेकिन कानूनी अस्पष्टता और स्थानीय प्रशासनिक ढील के कारण ऐसे मामले उभर रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में अदालतों और नियामक संस्थाओं की भूमिका निर्णायक बन गई है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और अन्य न्यायिक मंचों पर अरावली क्षेत्र में कथित अवैध गतिविधियों को लेकर याचिकाएँ दायर की गई हैं। हालिया कानूनी चर्चाओं में अरावली की परिभाषा को लेकर स्पष्टता लाने की कोशिश की गई है, जिससे यह तय हो सके कि किन क्षेत्रों को कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा। सरकारों और न्यायालयों का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

अरावली का भविष्य केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि जलवायु, सार्वजनिक स्वास्थ्य और क्षेत्रीय स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है। यह पर्वतमाला आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ लिए गए निर्णय आने वाली पीढ़ियों के जीवन की दिशा तय कर सकते हैं।

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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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