गोवा के बर्च बाय रोमियो लेन नाइटक्लब में लगी भीषण आग में 25 लोगों की मौत के बाद मामले के मुख्य आरोपियों गौरव और सौरभ लूथरा को दिल्ली अदालत से बड़ा झटका मिला है। दोनों भाइयों द्वारा दायर ट्रांजिट अग्रिम जमानत याचिका को अदालत ने गुरुवार को खारिज कर दिया, जबकि आरोपी थाईलैंड से लौटने के बाद तत्काल गिरफ्तारी से बचने के लिए चार हफ्ते की सुरक्षा मांग रहे थे।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वंदना ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट संकेत दिया कि कानून उनकी मदद नहीं कर सकता जो खुद कानूनी प्रक्रिया से बचने की कोशिश करते हैं। दोनों आरोपी 6 दिसंबर की रात नाइटक्लब में आग लगने के बाद जल्दबाज़ी में देश छोड़कर फुकेट भाग गए थे। अधिकारियों के अनुसार, आग की सूचना मिलते ही उन्होंने महज एक घंटे के भीतर अपनी टिकटें बुक कीं और तड़के इंडिगो की उड़ान से थाईलैंड रवाना हो गए, जबकि उसी समय क्लब के भीतर फंसे कर्मचारी जिंदा बचने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

सुनवाई के दौरान गोवा सरकार के वकील ने अदालत को बताया कि लूथरा बंधु घटना के तुरंत बाद गोवा से फरार हो गए और समन व कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उन्होंने कहा कि अग्रिम जमानत एक विवेकाधीन राहत है और ऐसे व्यक्तियों को नहीं दी जा सकती जो जांच से बचने के प्रयास में हों। अदालत को बताया गया कि इंटरपोल द्वारा ब्लू कॉर्नर नोटिस जारी किए जाने के बाद गुरुवार को थाईलैंड में दोनों भाइयों को हिरासत में ले लिया गया है। भारत सरकार की मांग पर सीबीआई और गोवा पुलिस समन्वय कर रही है ताकि दोनों आरोपियों को जल्द भारत लाया जा सके।

वहीं आरोपियों के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि दोनों भाई जांच में शामिल होने और भारत लौटने को तैयार हैं, इसलिए उन्हें कुछ दिनों की सुरक्षा दी जानी चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि अदालत को आत्मसमर्पण करने को तैयार नागरिकों की सहायता करनी चाहिए। हालांकि राज्य के वकील ने दोहराया कि आरोपी कानून से भाग रहे थे और ऐसे लोगों को किसी प्रकार की राहत नहीं दी जानी चाहिए।

घटना के बाद गोवा प्रशासन अवैध नाइटक्लबों पर सख्त कार्रवाई कर रहा है। अरपोरा में जिस नाइटक्लब में आग लगी थी, वह कृषि भूमि पर बिना जोन परिवर्तन के अवैध रूप से बनाया गया था। इसी क्रम में वगतोर स्थित एक अन्य क्लब को भी सील कर दिया गया और मालिकों को सात दिनों के भीतर जवाब देने का नोटिस जारी किया गया है।

यह मामला न केवल लापरवाही का गंभीर उदाहरण बनकर उभरा है, बल्कि यह भी सवाल खड़े करता है कि पर्यटकों से भरे इलाकों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी किस तरह जानलेवा हो सकती है। अदालत द्वारा राहत से इनकार ने संकेत दिया है कि इस मामले में जिम्मेदार लोगों को कानून से कोई बचाव नहीं मिलेगा।

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