क्या है भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI)? यह क्या काम करता है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत स्थापित FSSAI भारत में खाद्य पदार्थों की शुद्धता, लाइसेंसिंग और विनिर्माण मानकों को विनियमित करने वाली सर्वोच्च संस्था है।

भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में जब हम भोजन की थाली के सामने बैठते हैं, तो उस आहार की शुद्धता और गुणवत्ता के प्रति हमारा विश्वास भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI की सक्रियता पर निर्भर करता है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रशासनिक ढांचे के भीतर काम करने वाला यह वैधानिक निकाय आज देश के खाद्य पारिस्थितिकी तंत्र की धुरी बन चुका है। निर्माण से लेकर भंडारण, वितरण, बिक्री और आयात तक, खाद्य पदार्थों की हर प्रक्रिया को विनियमित करना इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। वर्तमान में सुश्री पुण्य सलिला श्रीवास्तव की अध्यक्षता और मुख्य कार्यकारी अधिकारी रजित पुन्हानी के नेतृत्व में यह संस्थान देश के करोड़ों नागरिकों के स्वास्थ्य हितों की रक्षा कर रहा है।
FSSAI की विकास यात्रा भारत के विनियामक इतिहास में एक बड़े सुधार का परिणाम है। 5 सितंबर 2008 को इसकी स्थापना 'खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006' के तहत की गई थी। इस ऐतिहासिक कानून ने खाद्य सुरक्षा से जुड़े सात पुराने और बिखरे हुए कानूनों को एक छत के नीचे समेट दिया, जिनमें 'खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954' और 'फल उत्पाद आदेश, 1955' जैसे महत्वपूर्ण कानून शामिल थे। इस एकीकरण का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं, व्यापारियों और निर्माताओं के मन से कानूनी भ्रम को दूर करना और एक एकल, विज्ञान-आधारित मानक प्रणाली स्थापित करना था। आज नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय और दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तथा चेन्नई में क्षेत्रीय कार्यालयों के माध्यम से यह प्राधिकरण पूरे देश पर अपनी निगरानी रखता है।
प्राधिकरण की कार्यप्रणाली बेहद सूक्ष्म और बहुआयामी है, जिसे सुचारू रूप से चलाने के लिए इसमें वैज्ञानिक समितियों और विभिन्न प्रभागों का एक विशाल ढांचा तैयार किया गया है। खाद्य योजकों (Additives), कीटनाशक अवशेषों और जैविक खतरों पर काम करने वाले पैनल यह सुनिश्चित करते हैं कि बाजार में बिकने वाला सामान अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो। FSSAI न केवल नियम बनाता है, बल्कि उनके प्रवर्तन के लिए खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को पुलिस की सर्च वारंट शक्ति के समान अधिकार भी देता है। इसकी गुणवत्ता जांच प्रणाली इतनी व्यापक है कि इसके पास 22 रेफरल प्रयोगशालाएं, 72 राज्य प्रयोगशालाएं और 112 NABL मान्यता प्राप्त निजी प्रयोगशालाओं का नेटवर्क है, जो दूध, तेल, अनाज और मांस जैसे उत्पादों की शुद्धता की कसौटी पर जांच करते हैं।
व्यापार को सुगम बनाने की दिशा में भी FSSAI ने क्रांतिकारी कदम उठाए हैं। 2021 में एक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेते हुए प्राधिकरण ने वार्षिक रिटर्न दाखिल करने की शर्त पर रेस्तरां और निर्माताओं को 'परपेचुअल लाइसेंस' (शाश्वत लाइसेंस) देने की व्यवस्था शुरू की। टर्नओवर के आधार पर लाइसेंसिंग की तीन श्रेणियां तय की गई हैं: 12 लाख रुपये से कम टर्नओवर के लिए पंजीकरण, 12 लाख से 20 करोड़ रुपये तक के लिए राज्य लाइसेंस और 20 करोड़ रुपये से ऊपर या ई-कॉमर्स संचालन के लिए केंद्रीय लाइसेंस अनिवार्य है। इसके अलावा, 'सेफ फूड, टेस्टी फूड' जैसे प्रोजेक्ट्स और 'राज्य खाद्य सुरक्षा सूचकांक' (SFSI) के माध्यम से राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा कर एक सुरक्षित खाद्य पारिस्थितिकी तंत्र बनाने का प्रयास निरंतर जारी है।
भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए FSSAI अब फोर्टिफिकेशन, न्यूट्रास्युटिकल्स और स्वास्थ्य पूरक आहारों के लिए भी कड़े मानक निर्धारित कर रहा है। हालांकि, व्यापक सर्वे में उपभोक्ताओं की ओर से और अधिक सख्ती की उम्मीदें जताई गई हैं, जो इस संस्थान की प्रासंगिकता को और बढ़ा देती हैं। एक नियामक के रूप में FSSAI की भूमिका केवल लाइसेंस देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अनुसंधान और डेटा संग्रह के माध्यम से उभरते जोखिमों की पहचान करता है और 'गामा' (GAMA) जैसे पोर्टल्स के जरिए भ्रामक विज्ञापनों पर भी लगाम लगाता है। इस प्रकार, यह संस्थान आज न केवल एक सरकारी कार्यालय है, बल्कि भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य और खाद्य अर्थव्यवस्था की सुरक्षा का सबसे बड़ा रक्षक बन गया है।

