क्या है भारत निर्वाचन आयोग? यह क्या काम करता है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत गठित निर्वाचन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया, ईवीएम का उपयोग और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में इसकी निर्णायक भूमिका।

भारत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रियाओं की शुचिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी है। इसकी महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह न केवल संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव आयोजित करता है, बल्कि देश के सर्वोच्च पदों यानी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की जिम्मेदारी भी इसी के कंधों पर होती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए यह आयोग स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए एक प्रहरी की भूमिका निभाता है। वर्तमान में यह एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्यरत है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं, जो सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।
इस ऐतिहासिक संस्था की यात्रा 25 जनवरी 1950 को शुरू हुई थी, जिसे आज हम कृतज्ञता के साथ 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' के रूप में मनाते हैं। अपनी स्थापना के समय यह एक एकल सदस्यीय निकाय था, लेकिन समय के साथ चुनावी चुनौतियों और कार्यभार को देखते हुए इसमें बदलाव किए गए। वर्ष 1989 में पहली बार इसे बहु-सदस्यीय बनाया गया और विभिन्न संशोधनों के दौर से गुजरते हुए 1 अक्टूबर 1993 से यह स्थायी रूप से तीन सदस्यीय स्वरूप में कार्य कर रहा है। नई दिल्ली स्थित 'निर्वाचन सदन' से संचालित होने वाला यह आयोग अपने सीमित कर्मचारियों के साथ मिलकर पूरे देश की प्रशासनिक मशीनरी को चुनाव के दौरान एक सूत्र में पिरोता है, जिसमें राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों से लेकर जिला निर्वाचन अधिकारियों तक की एक सुव्यवस्थित श्रृंखला शामिल होती है।
निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया भी भारतीय लोकतंत्र की गंभीरता को दर्शाती है, जहाँ राष्ट्रपति द्वारा एक उच्च स्तरीय समिति की सिफारिश पर इन्हें नियुक्त किया जाता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त का कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। उनकी स्वायत्तता की सुरक्षा के लिए उन्हें हटाने की प्रक्रिया को बहुत कठिन रखा गया है, जो केवल संसद के दोनों सदनों में महाभियोग के माध्यम से ही संभव है। यह संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करती है कि आयोग बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। आयोग के कार्यों का विस्तार मतदाता सूची तैयार करने से लेकर राजनीतिक दलों के पंजीकरण, चुनाव चिन्हों के आवंटन और चुनाव खर्च की निगरानी तक फैला हुआ है।
चुनावी शुचिता बनाए रखने के लिए आयोग ने वर्ष 1971 में पहली बार 'आदर्श आचार संहिता' जारी की थी, जो चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत का काम करती है। आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए आयोग ने चुनावी धोखाधड़ी रोकने के लिए 1993 में फोटो पहचान पत्र की शुरुआत की और बाद में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) तथा वीवीपीएटी (VVPAT) को अनिवार्य बनाया। निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का आलम यह है कि इसने वर्ष 2017 में ईवीएम हैकाथॉन जैसी चुनौतियों का आयोजन कर अपनी तकनीक की विश्वसनीयता को सिद्ध किया है। इसके अलावा, आयोग ने 'नोटा' (NOTA) विकल्प को शामिल कर मतदाताओं को अपनी असहमति दर्ज करने का भी अधिकार दिया है।
समावेशी लोकतंत्र के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए आयोग ने अब 80 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों के लिए घर से मतदान करने की सुविधा प्रदान की है। सेना और विदेश में तैनात सरकारी कर्मचारियों के लिए ईटीपीबी (ETPB) के माध्यम से डाक मतदान की व्यवस्था की गई है। चुनाव सुधारों की दिशा में आयोग लगातार कार्यरत रहता है, जिसमें दागी उम्मीदवारों पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन करना और चुनावी विज्ञापनों व खर्चों पर कड़ी नजर रखना शामिल है। अपनी इसी निष्पक्षता और दृढ़ता के कारण भारत निर्वाचन आयोग न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोकतांत्रिक संस्थानों के लिए एक आदर्श बना हुआ है।

