क्या वाकई बहू की कोई जिम्मेदारी नहीं? जानें इलाहाबाद हाईकोर्ट का अब तक का सबसे बड़ा फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण के अधिकार कानून द्वारा तय होते हैं, न कि केवल पारिवारिक संबंधों के आधार पर, जिससे परिवार और कानून के बीच संतुलन पर नई बहस छिड़ गई है।

शादी सांकेतिक तस्वीर
हाल ही में अल्लाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम और स्पष्ट संदेश देने वाला फैसला सुनाया है, जिसने पारिवारिक जिम्मेदारियों और कानूनी दायित्वों को लेकर चल रही बहस को नई दिशा दी है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि किसी भी बहू पर अपने सास-ससुर का आर्थिक भरण-पोषण करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है, भले ही परिस्थितियाँ भावनात्मक रूप से संवेदनशील क्यों न हों।
यह मामला आगरा के एक बुजुर्ग दंपति राकेश कुमार और उनकी पत्नी से जुड़ा था, जिन्होंने अपने बेटे प्रवेश की मृत्यु के बाद अपनी बहू, जो स्वयं एक कांस्टेबल हैं, से भरण-पोषण की मांग की थी। आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा का हवाला देते हुए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया, लेकिन अदालत ने उनके इस अनुरोध को खारिज कर दिया।
29 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति Madan Pal Singh ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के अधिकार पूरी तरह कानून द्वारा निर्धारित होते हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 (पूर्व में धारा 125 CrPC) के तहत केवल प्रत्यक्ष रिश्तों जैसे माता-पिता और संतान को ही इस प्रकार के दावे का अधिकार प्राप्त है। इस सूची में सास-ससुर को शामिल नहीं किया गया है, इसलिए बहू से इस आधार पर भरण-पोषण की मांग करना कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि परिवार के भीतर नैतिक जिम्मेदारियाँ हो सकती हैं, लेकिन यह स्पष्ट रूप से कहा कि नैतिक कर्तव्य और कानूनी दायित्व अलग-अलग हैं। जब तक किसी जिम्मेदारी को कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया जाता, तब तक उसे लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि बुजुर्गों के लिए सहायता के अन्य कानूनी रास्ते मौजूद हैं। विशेष रूप से, Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 के तहत वे अपने बच्चों (पुत्र या पुत्री) से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं।
यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह न केवल पारिवारिक संबंधों और जिम्मेदारियों के बीच स्पष्ट रेखा खींचता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत में भरण-पोषण संबंधी कानून संबंधों के आधार पर नहीं, बल्कि विधिक प्रावधानों के आधार पर तय होते हैं। इसके साथ ही, यह निर्णय महिला अधिकारों, पारिवारिक कानून और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर चल रही बहस में एक ठोस कानूनी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि संवेदनशील सामाजिक मुद्दों के समाधान के लिए केवल भावनात्मक आधार पर्याप्त नहीं है कानून की स्पष्टता और सीमाएँ ही अंतिम निर्धारक होती हैं।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
