ध्वजारोहण और ध्वज फहराने का अंतर: क्या आप जानते हैं 26 जनवरी और 15 अगस्त की संवैधानिक बारीकियां?
क्या आप जानते हैं कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगा फहराने का तरीका अलग क्यों होता है? प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच बँटी इन शक्तियों और लाल किले बनाम कर्तव्य पथ के ऐतिहासिक महत्व को समझें। जानिए ध्वजारोहण (Hoisting) और ध्वज फहराने (Unfurling) के बीच का वह अंतर जिसे हर भारतीय को जानना चाहिए।

नई दिल्ली | 27 जनवरी, 2026
राष्ट्रीय ध्वज 'तिरंगा' केवल तीन रंगों का संगम नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता और गौरव का जीवंत प्रतीक है। वर्ष में दो प्रमुख राष्ट्रीय पर्व—गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त)—मनाए जाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि इन दोनों अवसरों पर तिरंगा फहराने की प्रक्रिया और परंपरा पूरी तरह भिन्न होती है? राष्ट्र के अधिकांश नागरिकों के लिए यह केवल उत्सव का क्षण होता है, परंतु इसके पीछे गहरे संवैधानिक और ऐतिहासिक अर्थ छिपे हैं।
15 अगस्त बनाम 26 जनवरी: ध्वज की यात्रा और शक्ति का केंद्र
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच ध्वजारोहण के नियमों में बुनियादी अंतर 'शक्ति के हस्तांतरण' और 'संविधान की सर्वोच्चता' से जुड़ा है।
मुख्य अंतर और प्रक्रियाएँ:
- ध्वजारोहण (Flag Hoisting): 15 अगस्त को तिरंगा नीचे से ऊपर खींचा जाता है और फिर फहराया जाता है। इसे 'ध्वजारोहण' कहते हैं। यह 1947 में ब्रिटिश झंडे को उतारकर भारतीय ध्वज को ऊपर ले जाने और एक नए स्वतंत्र राष्ट्र के उदय का प्रतीक है।
- ध्वज फहराना (Unfurling): 26 जनवरी को झंडा स्तंभ के शीर्ष पर ही बंधा रहता है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा केवल खोलकर फहराया जाता है। इसे 'ध्वज फहराना' या 'Unfurling' कहा जाता है, क्योंकि भारत पहले से ही स्वतंत्र था और यह दिन संविधान लागू होने का उत्सव है।
- नेतृत्व का अंतर: स्वतंत्रता दिवस पर देश का नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं, क्योंकि आजादी के समय संविधान लागू नहीं हुआ था और प्रधानमंत्री ही वास्तविक कार्यकारी प्रमुख थे। इसके विपरीत, गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति ध्वज फहराते हैं, क्योंकि वे राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख हैं।
संवैधानिक मर्यादा और स्थान का महत्व
न केवल फहराने की विधि, बल्कि स्थान का भी अपना विशेष महत्व है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से ध्वजारोहण करते हैं, जो उस सत्ता का केंद्र है जहाँ से आजादी की घोषणा हुई थी। वहीं, 26 जनवरी को कर्तव्य पथ (पूर्व में राजपथ) पर राष्ट्रपति द्वारा ध्वज फहराया जाता है, जहाँ देश अपनी सैन्य शक्ति और सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करता है।
राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति जागरूकता
इन सूक्ष्म अंतरों को समझना हर भारतीय नागरिक का कर्तव्य है। यह न केवल हमारे प्रोटोकॉल की सटीकता को दर्शाता है, बल्कि उस लंबी लोकतांत्रिक यात्रा का भी सम्मान करता है जो हमने एक उपनिवेश से एक शक्तिशाली गणराज्य बनने तक तय की है। ध्वज फहराने की यह अलग-अलग पद्धतियां हमें याद दिलाती हैं कि हमारा लोकतंत्र नियमों और परंपराओं की कितनी मजबूत नींव पर टिका है।

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