भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला अरावली एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। वर्ष 2025 के अंत में सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले ने न केवल अरावली पहाड़ियों की कानूनी परिभाषा को नया रूप दिया है, बल्कि इसके पर्यावरणीय संरक्षण, खनन गतिविधियों और भविष्य की हरित रणनीतियों पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब देश पहले से ही जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण और वायु प्रदूषण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है।


नवंबर–दिसंबर 2025 के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक केंद्रीय समिति द्वारा प्रस्तावित अरावली पहाड़ियों की नई एकरूप कानूनी परिभाषा को स्वीकार किया। इस परिभाषा के अनुसार अब केवल वही भू-आकृतियां “अरावली पहाड़ी” मानी जाएंगी, जिनकी ऊँचाई स्थानीय भू-स्तर से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। इस तथाकथित “100 मीटर नियम” ने पर्यावरणविदों और संरक्षण संगठनों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि अरावली की अधिकांश छोटी पहाड़ियाँ, रिज और प्राकृतिक ढलानें इस मानक के दायरे से बाहर हो सकती हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इससे अरावली क्षेत्र का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा कानूनी संरक्षण से वंचित हो सकता है।


इस नई परिभाषा का सीधा असर वन संरक्षण अधिनियम के तहत मिलने वाली सुरक्षा पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। जिन क्षेत्रों को अब कानूनी रूप से अरावली नहीं माना जाएगा, वहां वन भूमि का दर्जा समाप्त हो सकता है, जिससे बड़े पैमाने पर खनन और निर्माण गतिविधियों के लिए रास्ता खुलने की संभावना बढ़ जाएगी। यह स्थिति विशेष रूप से हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर के संवेदनशील इलाकों के लिए गंभीर मानी जा रही है।


हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस संकीर्ण परिभाषा के साथ-साथ खनन को लेकर एक “संतुलित और चरणबद्ध दृष्टिकोण” भी अपनाया है। अदालत ने वैज्ञानिक आधार पर व्यापक मैपिंग और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन पूरा होने तक नए खनन पट्टों और पुराने लाइसेंसों के नवीनीकरण पर रोक लगा दी है। इसके अलावा, संरक्षित वन्यजीव आवासों, जलस्रोतों, टाइगर कॉरिडोर और महत्वपूर्ण भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध जारी रखने का निर्देश दिया गया है।


इसी बीच केंद्र सरकार ने जून 2025 में “अरावली ग्रीन वॉल परियोजना” की शुरुआत कर इस पर्वतमाला के पुनर्जीवन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 29 जिलों में अरावली के साथ 5 किलोमीटर चौड़ा हरित बफर जोन विकसित किया जाना है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि को पुनर्स्थापित कर मरुस्थलीकरण को रोकना और कार्बन अवशोषण क्षमता को बढ़ाना है।


इसके बावजूद, नई कानूनी परिभाषा को लेकर पर्यावरणीय और राजनीतिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली की हरित ढाल कमजोर होने से दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता और खराब होगी, धूल भरी आंधियों की तीव्रता बढ़ेगी और भूजल स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। राजनीतिक मोर्चे पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा जैसे नेताओं ने इस फैसले को अरावली के लिए “मृत्युदंड” करार देते हुए #SaveAravalli अभियान को समर्थन दिया है।


अरावली पर यह कानूनी और नीतिगत खींचतान केवल पहाड़ियों की परिभाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के पर्यावरणीय संतुलन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सतत विकास के भविष्य से भी गहराई से जुड़ी हुई है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि संरक्षण और विकास के बीच यह संतुलन भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला को बचा पाएगा या नहीं।

Updated On
Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

Next Story