आय से अधिक संपत्ति मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट ने पलटा, कहा- आरोपी को बचाव का निष्पक्ष अवसर नहीं मिला और साक्ष्य अपर्याप्त थे।

करीब एक दशक पहले विशेष सीबीआई अदालत द्वारा आय से अधिक संपत्ति मामले में दोषी ठहराए गए भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल आनंद कुमार कपूर को दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि बचाव पक्ष को अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का सार्थक अवसर नहीं दिया गया, जिससे पूरा ट्रायल प्रभावित हुआ और दोषसिद्धि कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती। साथ ही अदालत ने अभियोजन स्वीकृति को भी "मस्तिष्क का समुचित उपयोग न करने" का परिणाम बताते हुए कानूनी रूप से अवैध ठहराया।

न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की एकल पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत वर्ष 2016 में हुई दोषसिद्धि के खिलाफ आनंद कुमार कपूर की अपील स्वीकार कर ली। मामला भारतीय सेना में सेवा के दौरान ज्ञात आय के स्रोतों से लगभग 2.22 करोड़ रुपये अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपों से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन की स्वीकृति बिना उचित विचार के दी गई थी, इसलिए वह वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती।

अदालत ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई की अवधारणा भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र का केंद्रीय आधार है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सेवकों पर भ्रष्टाचार के आरोप गंभीर होते हैं और उनसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए, लेकिन दोषसिद्धि तभी कायम रह सकती है जब मुकदमे में आरोपी को प्रभावी बचाव का पूरा अवसर मिले।

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष को साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए लगभग छह महीने का समय दिया गया, जबकि बचाव पक्ष को प्रभावी रूप से केवल तीन सुनवाई की तारीखें मिलीं। आनंद कुमार कपूर ने नौ बचाव गवाहों की सूची दी थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने केवल चार गवाहों की गवाही दर्ज करने के बाद बचाव पक्ष के साक्ष्य अचानक बंद कर दिए।

अदालत ने यह भी कहा कि बचाव साक्ष्य दर्ज करने की अंतिम निर्धारित तारीख पर वकीलों की हड़ताल के कारण अधिवक्ताओं ने काम नहीं किया था। ऐसे में आनंद कुमार कपूर ने सीमित अवधि के लिए स्थगन की मांग की थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने केवल इस आधार पर इसे खारिज कर दिया कि सर्वोच्च न्यायालय ने मुकदमे का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि स्थगन का अनुरोध कार्यवाही को अनिश्चितकाल तक टालने के उद्देश्य से नहीं था, बल्कि वकीलों की हड़ताल जैसी परिस्थितियों में उचित अवसर देने के लिए था। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने केवल सर्वोच्च न्यायालय की समय-सीमा का पालन करने को प्राथमिकता दी और यह नहीं देखा कि अतिरिक्त अवसर से इनकार करने पर आरोपी के बचाव पर कितना गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

अदालत ने कहा कि प्रक्रियात्मक समय-सीमा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी से ऊपर नहीं हो सकती। किसी आपराधिक मुकदमे को समय-सीमा पूरी करने की दौड़ में नहीं बदला जा सकता, जहां प्रक्रियात्मक समय-सीमा के पालन के कारण निष्पक्षता, विधिसम्मत प्रक्रिया और आरोपी के पूर्ण बचाव के अधिकार की अनदेखी हो जाए।

प्रक्रियात्मक कमियों के अलावा हाईकोर्ट ने पूरे साक्ष्य का स्वतंत्र रूप से पुनर्मूल्यांकन किया और निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आय से अधिक संपत्ति का आरोप संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

संपत्ति-दर-संपत्ति साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के दृष्टिकोण में कई गंभीर त्रुटियां थीं। भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्धि सतही या औपचारिक तरीके से दर्ज नहीं की जा सकती। अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने विधिसम्मत साक्ष्यों के बजाय अनुमान और अटकलों पर भरोसा किया।

दिल्ली स्थित बेसमेंट संपत्ति के मूल्यांकन को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि आनंद कुमार कपूर ने पंजीकृत बिक्री विलेख में दर्ज राशि से अधिक भुगतान किया था।

गोवा स्थित संपत्ति के संबंध में अदालत ने कहा कि केवल बेटे के नाम संपत्ति होने के आधार पर उसकी मालिकाना हक आनंद कुमार कपूर को नहीं सौंपा जा सकता। जांच अधिकारी ने न तो धन के स्रोत की जांच की और न ही बेटे या विक्रेता से पूछताछ की।

इसी प्रकार अदालत ने कहा कि कुछ निवेश, नकद जमा और अन्य परिसंपत्तियां भी गलत तरीके से आनंद कुमार कपूर की संपत्ति में शामिल कर ली गईं, जबकि उपलब्ध साक्ष्य बताते थे कि वे उनकी मां और अन्य परिवार के सदस्यों की थीं या उन्हीं के वित्तीय सहयोग से खरीदी गई थीं।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन स्वीकृति में तथ्यों पर समुचित विचार नहीं किया गया और यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी लोक सेवक के अभियोजन के लिए निर्धारित वैधानिक मानकों पर खरी नहीं उतरती। अदालत ने माना कि यह दोषपूर्ण स्वीकृति भी दोषसिद्धि रद्द करने का स्वतंत्र आधार है।

विशेष सीबीआई अदालत ने वर्ष 2016 में आनंद कुमार कपूर को एक वर्ष के कठोर कारावास, 50 हजार रुपये के जुर्माने और लगभग 2.22 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियां जब्त करने की सजा सुनाई थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अंततः कहा कि अभियोजन पक्ष कानून के अनुरूप अपना मामला सिद्ध नहीं कर सका और आनंद कुमार कपूर को प्रभावी बचाव का निष्पक्ष अवसर भी नहीं मिला। इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि, सजा तथा संपत्ति जब्ती का आदेश रद्द करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Pratahkal Newsroom

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