क्या है वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR)? यह क्या काम करता है और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाला सीएसआईआर 37 प्रयोगशालाओं के साथ अंतरिक्ष से लेकर स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता और औद्योगिक विकास को सशक्त बना रहा है।

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद, जिसे दुनिया भर में 'सीएसआईआर' (CSIR) के नाम से जाना जाता है, आज भारत की वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति का सबसे मजबूत आधार स्तंभ है। नई दिल्ली में मुख्यालय वाली यह संस्था न केवल भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक वित्त पोषित अनुसंधान एवं विकास (R&D) संस्था है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में इसका गहरा प्रभाव है। वर्तमान में महानिदेशक डॉ. एन. कलैसेल्वी के नेतृत्व में यह परिषद भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त निकाय के रूप में संचालित होती है। सीएसआईआर की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके अध्यक्ष स्वयं देश के प्रधानमंत्री होते हैं। आज यह संस्था अंतरिक्ष विज्ञान, महासागर विज्ञान, जीवन विज्ञान, पेट्रोलियम, खनन और पर्यावरण जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी 37 अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं और 14,000 से अधिक कर्मचारियों के विशाल नेटवर्क के साथ देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को निरंतर सशक्त कर रही है।
सीएसआईआर की वर्तमान उपलब्धियों की जड़ें भारत के स्वतंत्रता संग्राम और औद्योगिक क्रांति की आकांक्षाओं में छिपी हैं। 1930 के दशक में जब भारत में प्राकृतिक संसाधनों के विकास के लिए एक केंद्रीय अनुसंधान निकाय की आवश्यकता महसूस हुई, तब सी. वी. रमन और जे. सी. घोष जैसे प्रख्यात वैज्ञानिकों ने एक सलाहकार बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रखा था। हालांकि औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार ने शुरुआत में इसे खारिज कर दिया था, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध की आहट और सर अर्कोट रामास्वामी मुदलियार के निरंतर प्रयासों ने इसकी राह प्रशस्त की। अंततः 26 सितंबर 1942 को एक स्वायत्त निकाय के रूप में सीएसआईआर की स्थापना हुई। इसके संस्थापक निदेशक डॉ. शांति स्वरूप भटनागर के विजन का ही परिणाम था कि आजादी से पहले ही देश में राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला और राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला जैसी पांच प्रमुख प्रयोगशालाओं की नींव रखी जा चुकी थी, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के औद्योगिक ढांचे को आकार दिया।
तकनीकी नवाचार और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में सीएसआईआर की यात्रा असाधारण रही है। संस्था के पास वर्तमान में 14,000 से अधिक वैश्विक पेटेंट हैं और इसे भारत के शीर्ष अनुसंधान संस्थान के रूप में राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। इसकी महत्ता केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने आम भारतीयों के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है। भारत की पहली सिंथेटिक दवा 'मेथाक्वालोन' बनाने से लेकर देश के पहले स्वदेशी ट्रैक्टर 'स्वराज' और 'सोनालिका' के विकास तक, सीएसआईआर ने आत्मनिर्भर भारत की नींव बहुत पहले ही रख दी थी। इतना ही नहीं, चुनावी स्याही (Indelible Ink) जो हर भारतीय मतदाता की पहचान है, वह भी इसी संस्थान की देन है।
सीएसआईआर की विशेषज्ञता केवल भारी उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा में भी मील के पत्थर स्थापित किए हैं। महिलाओं के लिए दुनिया की पहली गैर-स्टेरॉयड गर्भनिरोधक गोली 'सहेली' का विकास हो या हल्दी और नीम के पारंपरिक ज्ञान पर विदेशी पेटेंट के दावों को अंतरराष्ट्रीय अदालतों में चुनौती देकर जीतना, इस परिषद ने भारत की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत की रक्षा की है। हाल के वर्षों में सीएसआईआर ने 'सारस' (SARAS) जैसे नागरिक विमानों के डिजाइन, मानव जीनोम की अनुक्रमण (Sequencing) और कोविड-19 महामारी के दौरान 'सेप्सिवैक' जैसी दवाओं के नैदानिक परीक्षणों के माध्यम से आधुनिक चुनौतियों का सामना करने की अपनी क्षमता को सिद्ध किया है।
वैज्ञानिक प्रतिभाओं को निखारने के लिए सीएसआईआर का योगदान अतुलनीय है। 1958 में स्थापित 'शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार' आज भारत में विज्ञान के क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है। यह पुरस्कार न केवल शोधकर्ताओं को प्रोत्साहित करता है बल्कि जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों में मौलिक योगदान देने वाले 45 वर्ष से कम आयु के युवा वैज्ञानिकों को वैश्विक पहचान दिलाता है। अपनी 39 आउटरीच केंद्रों और दर्जनों विशिष्ट प्रयोगशालाओं के माध्यम से सीएसआईआर आज भी देश के कोने-कोने में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार कर रहा है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि भारत वैश्विक अनुसंधान और विकास के मानचित्र पर अग्रणी बना रहे।

