चिनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट- पाकिस्तान की आपत्ति दरकिनार, अपने हक के पानी से प्यासी भारतीय धरती को सींचेगा हिंदुस्तान!
हिमाचल प्रदेश में 2,352 करोड़ की लागत से बनने वाली 9 किमी लंबी सुरंग से दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान का जल संकट खत्म होगा।

हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति क्षेत्र में जल डाइवर्जन परियोजना के तहत पहाड़ी को काटकर बनाई जा रही भूमिगत सुरंग का निर्माण कार्य।
नई दिल्ली: देश के उत्तरी और पश्चिमी राज्यों को भीषण जल संकट से परमानेंट मुक्ति दिलाने के लिए भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक कदम उठा लिया है। केंद्र सरकार ने महत्वाकांक्षी चिनाब-ब्यास लिंक टनल प्रोजेक्ट पर धरातल पर काम शुरू करने का फैसला किया है। करीब 2,352 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार होने वाली यह परियोजना न केवल देश के भीतर पानी के वितरण की पूरी तस्वीर बदल देगी, बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान की रणनीतिक और कूटनीतिक धड़कनों को भी बढ़ा चुकी है। इस बड़े प्रोजेक्ट के जरिए भारत अपनी जल क्षमता को नया विस्तार देने जा रहा है।
जल शक्ति मंत्रालय से प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस पूरे प्रोजेक्ट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) पूरी तरह से तैयार की जा चुकी है। इस प्रोजेक्ट के निर्माण कार्य की शुरुआत इसी वर्ष अगस्त महीने से होने की उम्मीद जताई जा रही है। परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने दो साल का कड़ा समय निर्धारित किया है, जबकि विषम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसकी अधिकतम समय सीमा वर्ष 2029 तय की गई है। इस बुनियादी ढांचे के विकास से भारत अपने हिस्से के पानी का शत-प्रतिशत और कुशल उपयोग सुनिश्चित कर सकेगा।
इस रणनीतिक परियोजना की भौगोलिक संरचना को समझें तो इसका मुख्य केंद्र बिंदु हिमाचल प्रदेश का जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति बनने जा रहा है। यहां के कोकसर नामक इलाके में चिनाब नदी की प्रमुख सहायक नदी, चंद्रा नदी पर एक अत्याधुनिक बैराज का निर्माण किया जाएगा। भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार, गर्मियों के मौसम में जब ऊंचे हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, तब चंद्रा नदी में पानी का प्रवाह अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है। वर्तमान में इस अतिरिक्त पानी का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी मानवीय उपयोग के यूं ही आगे बह जाता है। इस बर्बादी को रोकने के लिए लाहौल-स्पीति की कठिन पहाड़ियों को चीरते हुए लगभग 9 किलोमीटर लंबी एक विशालकाय भूमिगत सुरंग बनाई जाएगी। इसी सुरंग के माध्यम से चंद्रा नदी के अतिरिक्त जल को ब्यास नदी में सफलतापूर्वक डाइवर्ट कर दिया जाएगा।
इस डाइवर्जन का सीधा और सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों पर पड़ेगा। ये तमाम राज्य हर साल गर्मी के मौसम में गंभीर जल संकट और घटते भूजल स्तर की समस्या से बुरी तरह जूझते हैं। ब्यास नदी में पहुंचने वाला यह अतिरिक्त पानी सीधे तौर पर इन प्यासे राज्यों की नहर प्रणालियों और पेयजल ग्रिडों को पुनर्जीवित करेगा। सरल शब्दों में कहें तो भारत अब अपने प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा चक्रव्यूह तैयार कर रहा है, जिससे बाढ़ जैसी स्थिति पैदा करने वाला अतिरिक्त पानी देश के सबसे सूखे और जरूरतमंद हिस्सों की प्यास बुझाने के काम आ सके।
इस विकास खंड के सामने आते ही सीमा पार पाकिस्तान में भारी खलबली और बेचैनी का माहौल देखा जा रहा है। दरअसल, चिनाब नदी ऐतिहासिक सिंधु नदी प्रणाली (Indus River System) का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका प्रवाह भारत से होते हुए सीधे पाकिस्तान की ओर जाता है। पाकिस्तान एक लंबे समय से अपनी कृषि और घरेलू जरूरतों के लिए चिनाब नदी के पानी पर पूरी तरह निर्भर रहा है। ऐसे में भारत द्वारा पानी को मोड़ने की इस योजना को पाकिस्तान एक बड़े रणनीतिक झटके के रूप में देख रहा है। उसे डर है कि इस टनल के चालू होने के बाद उसकी ओर जाने वाले पानी की मात्रा और नियंत्रण पर भारत का सीधा दबदबा स्थापित हो जाएगा।
हालांकि, भारत सरकार ने कूटनीतिक और कानूनी मोर्चे पर अपनी स्थिति पहले ही पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। भारतीय अधिकारियों का साफ तौर पर कहना है कि यह पूरा प्रोजेक्ट वर्ष 1960 में हस्ताक्षरित हुई ऐतिहासिक 'सिंधु जल संधि' (Indus Water Treaty) के सभी कानूनी दायरों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के भीतर रहकर ही बनाया जा रहा है। इस संधि के तहत भारत को अपनी सीमाओं के भीतर बहने वाली नदियों के पानी का गैर-उपभोग्य (Non-consumptive) और निर्धारित सीमा तक इस्तेमाल करने का पूरा कानूनी अधिकार प्राप्त है। भारत का यह कदम किसी भी अंतरराष्ट्रीय नियम का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि यह अपने हिस्से के राष्ट्रीय जल संसाधनों के अधिकतम और इष्टतम उपयोग की संप्रभु नीति का हिस्सा है।
तमाम कूटनीतिक आपत्तियों और भौगोलिक चुनौतियों को दरकिनार करते हुए भारत का यह कदम देश के जल प्रबंधन इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। दो से तीन वर्षों के भीतर जब यह टनल पूरी तरह चालू हो जाएगी, तब देश के करोड़ों नागरिकों को पानी की किल्लत से बड़ी राहत मिलेगी। यह परियोजना साफ संदेश देती है कि भारत अब अपनी जल सुरक्षा को लेकर किसी भी स्तर पर समझौता करने के मूड में नहीं है और वह अपनी सीमाओं के भीतर विकास की नई गाथा लिखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
