भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखने में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) एक आधार स्तंभ की भूमिका निभाता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय के रूप में, यह बोर्ड देश में फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को विनियमित करने के लिए उत्तरदायी है। इसकी महत्ता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि भारत में सिनेमाघरों या टेलीविजन पर किसी भी व्यावसायिक फिल्म का प्रदर्शन तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक उसे इस बोर्ड द्वारा प्रमाणित न कर दिया जाए। सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 के प्रावधानों के तहत कार्य करते हुए, बोर्ड न केवल फिल्मों को श्रेणियों में बांटता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि जनमानस के सामने पेश किया जाने वाला मनोरंजन स्वस्थ और सुरक्षित हो।

इस नियामक संस्था की यात्रा भारतीय सिनेमा के इतिहास के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। भारत की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' के निर्माण के सात साल बाद, 1920 में पहली बार सिनेमैटोग्राफ अधिनियम लागू हुआ था। उस समय सेंसर बोर्ड मद्रास, बॉम्बे, कलकत्ता, लाहौर और रंगून जैसे शहरों में पुलिस प्रमुखों के अधीन स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करते थे। स्वतंत्रता के पश्चात इन क्षेत्रीय निकायों को बॉम्बे बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स में समाहित कर दिया गया। कालांतर में, 1952 के अधिनियम के माध्यम से इसे 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स' के रूप में पुनर्गठित किया गया और अंततः 1983 के नियमों में संशोधन के साथ इसे इसका वर्तमान नाम 'केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड' प्राप्त हुआ। यह विकासक्रम दर्शाता है कि कैसे समय के साथ राज्य ने फिल्म प्रमाणन को एक संगठित और पेशेवर स्वरूप प्रदान किया।

प्रमाणन की प्रक्रिया में बोर्ड वर्तमान में चार मुख्य श्रेणियों के तहत प्रमाण पत्र जारी करता है, जो दर्शकों की आयु और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हैं। प्रारंभ में केवल 'U' (अप्रतिबंधित सार्वजनिक प्रदर्शन) और 'A' (केवल वयस्कों के लिए) श्रेणियां थीं, लेकिन जून 1983 में 'U/A' और 'S' श्रेणियां जोड़ी गईं। 'U' श्रेणी की फिल्में परिवार के अनुकूल होती हैं, जबकि 'S' श्रेणी केवल डॉक्टरों या वैज्ञानिकों जैसे विशेष समूहों के लिए आरक्षित होती है। आधुनिक युग की बदलती जरूरतों को देखते हुए, नवंबर 2024 में बोर्ड ने 'U/A' श्रेणी को और अधिक सूक्ष्मता प्रदान की है, जिसमें अब U/A 7+, U/A 13+ और U/A 16+ जैसी आयु-विशिष्ट उप-श्रेणियां शामिल हैं। यह वर्गीकरण माता-पिता को यह निर्णय लेने में मदद करता है कि उनके बच्चों के लिए कौन सी सामग्री उपयुक्त है, विशेषकर उन फिल्मों में जहां मध्यम हिंसा या जटिल विषय शामिल हो सकते हैं।

बोर्ड का कार्य केवल वर्गीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कुछ कड़े सिद्धांतों और दिशा-निर्देशों के आधार पर फिल्मों को प्रतिबंधित करने की शक्ति भी रखता है। असामाजिक गतिविधियों या हिंसा का महिमामंडन, नशीली दवाओं के सेवन को प्रोत्साहन, और महिलाओं या किसी सामाजिक समूह के प्रति अपमानजनक चित्रण पर बोर्ड कड़ा रुख अपनाता है। इसके अलावा, राष्ट्रीय प्रतीकों का दुरुपयोग या विदेशी राज्यों के साथ संबंधों को प्रभावित करने वाली सामग्री पर भी प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यह सुनिश्चित करना बोर्ड की प्राथमिकता है कि फिल्मों के माध्यम से सांप्रदायिक या वैज्ञानिक विरोधी दृष्टिकोण को बढ़ावा न मिले। यदि कोई फिल्म इन मानकों पर खरी नहीं उतरती, तो बोर्ड उसे प्रमाण पत्र देने से इनकार भी कर सकता है।

नियमों के प्रवर्तन के मामले में यह बोर्ड अत्यंत सख्त है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि फिल्मों का प्रदर्शन केवल उन्हीं दर्शकों के सामने हो जिनके लिए वे प्रमाणित हैं। उदाहरण के तौर पर, 'A' रेटिंग वाली फिल्मों में नाबालिगों को प्रवेश देने पर थिएटर प्रबंधकों और स्टाफ की गिरफ्तारी तक के कानूनी प्रावधान हैं। हाल के वर्षों में, पारदर्शिता लाने के लिए बोर्ड ने आधुनिक तकनीक को अपनाया है, जिससे फिल्म निर्माताओं के लिए प्रमाणन की प्रक्रिया सुगम और स्पष्ट हुई है। हालांकि 2021 में फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (FCAT) को समाप्त कर दिया गया, लेकिन बोर्ड अब भी सिनेमाई रचनात्मकता और सामाजिक मर्यादा के बीच एक अनिवार्य सेतु के रूप में कार्य कर रहा है, जिससे भारतीय मनोरंजन जगत वैश्विक मानकों के अनुरूप बना रहे।

Pratahkal HQ

Pratahkal HQ

Next Story