West Bengal Assembly dispute 2026 : पश्चिम बंगाल की सियासत में चल रहा शह और मात का खेल अब अदालत की चौखट पर पहुंच चुका है, जहां तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के आधिकारिक गुट को एक बड़ा कानूनी झटका लगा है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए कोई भी अंतरिम आदेश जारी करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत के इस रुख के बाद विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) द्वारा लिया गया फैसला फिलहाल पूरी तरह बरकरार रहेगा, जिसका सीधा मतलब यह है कि टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी ही इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर बने रहेंगे। इस मामले ने राज्य की राजनीति में उस समय भूचाल ला दिया था जब टीएमसी के वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने ऋतब्रत बनर्जी की नियुक्ति को अवैध बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन अदालत से उन्हें तुरंत कोई राहत नहीं मिल सकी।

इस पूरे राजनीतिक ड्रामे की शुरुआत तब हुई जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए एक ही सत्तारूढ़ दल के भीतर से दो अलग-अलग दावेदार सामने आ गए। टीएमसी के मुख्यधारा के नेतृत्व वाले गुट ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम का प्रस्ताव आगे बढ़ाया था, लेकिन पार्टी के भीतर बगावत का झंडा बुलंद करने वाले विधायकों के गुट ने ऋतब्रत बनर्जी के नाम का पासा फेंक दिया। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने बागी गुट के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक रूप से नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर दिया था, जिसे ममता बनर्जी के खेमे ने अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई बना लिया। गुरुवार को इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस कृष्ण राव की पीठ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट स्पीकर के निर्णय में फिलहाल कोई दखल नहीं दे रहा है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपने-अपने विरोध हलफनामे और जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई के लिए २८ जुलाई की तारीख मुकर्रर की है।

इस कानूनी दांवपेच के बीच टीएमसी सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालती रुख पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हालांकि कोर्ट ने कोई अंतरिम राहत नहीं दी है, लेकिन मुख्य याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है, जिससे अब इस पूरे विवाद पर अंतिम और विस्तृत सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है। इससे पहले मंगलवार को हुई बहस के दौरान जस्टिस कृष्ण राव ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी सवाल उठाया था कि यदि एक ही राजनीतिक दल से दो विरोधी गुट अलग-अलग नाम भेजते हैं, तो ऐसी स्थिति में स्पीकर का क्या कर्तव्य बनता है। क्या अध्यक्ष स्वतः संज्ञान लेकर निर्णय ले सकते हैं या उन्हें दोनों पक्षों को बकायदा सुनना चाहिए। इसके जवाब में स्पीकर की पैरवी कर रहे अधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल विधानसभा परिलब्धियां अधिनियम, १९३७ का हवाला देते हुए दलील दी कि सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता के रूप में जिसे मान्यता मिलती है, वही नेता प्रतिपक्ष होता है और यदि संख्याबल या नेतृत्व को लेकर कोई भी विवाद खड़ा होता है, तो उसमें अध्यक्ष का फैसला ही अंतिम और निर्णायक माना जाता है।

कानूनी लड़ाई से इतर, इस विवाद के पीछे विधायकों के कथित फर्जी हस्ताक्षर का एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज पहलू भी जुड़ा हुआ है जिसने इस मामले को पूरी तरह से आपराधिक मोड़ दे दिया है। आरोप है कि टीएमसी सांसद और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर से शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नाम का जो आधिकारिक प्रस्ताव भेजा गया था, उस पर कई विधायकों के हस्ताक्षर पूरी तरह से जाली हैं। इस कथित धोखाधड़ी का भंडाफोड़ सबसे पहले खुद ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने किया था और इसकी शिकायत दर्ज कराई थी। विधायकों की इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए विधानसभा सचिव ने एक एफआईआर दर्ज कराई, जिसके बाद पश्चिम बंगाल की अपराध जांच शाखा (सीआईडी) ने इस पूरे मामले की औपचारिक तफ्तीश अपने हाथ में ले ली है। वर्तमान में सीआईडी की टीमें उन सभी विधायकों के बयान दर्ज कर रही हैं जिनके नाम उस विवादित दस्तावेज पर मौजूद हैं, साथ ही उनके हस्ताक्षरों के फॉरेंसिक नमूने भी लिए जा रहे हैं।

कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला और साथ में चल रही सीआईडी की आपराधिक जांच आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाली साबित होगी। एक तरफ जहां बागी गुट अदालत से तात्कालिक राहत पाकर खुद को मजबूत महसूस कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ फर्जी हस्ताक्षर के आरोपों की जांच टीएमसी के भीतर चल रही आंतरिक गुटबाजी और सत्ता के संघर्ष को जनता के सामने पूरी तरह बेनकाब कर रही है। २८ जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर अब पूरे राज्य की नजरें टिकी हैं, क्योंकि कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी का भविष्य तय करेगा, बल्कि सदन के भीतर दलबदल कानून और स्पीकर के विशेषाधिकारों की सीमाओं को भी नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।


Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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