BCCI की समानता नीति सिर्फ दिखावा ; जीत के बावजूद महिला क्रिकेटरों की आर्थिक पहचान अधूरी?
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की 2025 विश्वकप जीत ने इतिहास रचा, लेकिन BCCI द्वारा दिया गया 51 करोड़ रुपये का पुरस्कार पुरुष टीम के 125 करोड़ से कम, लैंगिक समानता और खेल में निष्पक्ष पुरस्कार प्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

इंडिया विमेंस क्रिकेट टीम
भारतीय क्रिकेट में वर्ष 2025 ऐतिहासिक रूप से याद किया जाएगा, जब महिलाओं की राष्ट्रीय टीम ने पहली बार ICC Women’s Cricket World Cup जीतकर देश को गौरवान्वित किया। यह जीत न केवल खेल उपलब्धि थी, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन की प्रतीक थी जिसकी दिशा में क्रिकेट जगत पिछले कुछ वर्षों से आगे बढ़ रहा है। Board of Control for Cricket in India (BCCI) ने कुछ समय पहले ही पुरुष और महिला खिलाड़ियों के लिए समान मैच‑फीस नीति लागू की थी। इस नीति की घोषणा करते हुए बीसीसीआई सचिव जय शाह ने कहा था कि अब से “पुरुष और महिला क्रिकेटरों की मैच फीस एक समान होगी।” यह घोषणा भारतीय खेल जगत में एक प्रगतिशील मील का पत्थर मानी गई, जिसने खेल में लैंगिक समानता की नई शुरुआत की।
I’m pleased to announce @BCCI’s first step towards tackling discrimination. We are implementing pay equity policy for our contracted @BCCIWomen cricketers. The match fee for both Men and Women Cricketers will be same as we move into a new era of gender equality in 🇮🇳 Cricket. pic.twitter.com/xJLn1hCAtl
— Jay Shah (@JayShah) October 27, 2022
हालाँकि, समान मैच‑फीस लागू होने के बावजूद यह सवाल कायम है कि क्या क्रिकेट में असमानता केवल फीस तक सीमित नहीं रह गई है? महिला टीम की विश्वकप जीत के बाद बीसीसीआई ने उन्हें 51 करोड़ रुपये का नकद पुरस्कार दिया। यह राशि सराहनीय है, लेकिन तुलनात्मक रूप से पुरुष टीम को 2024 में T20 World Cup जीतने पर दिए गए लगभग 125 करोड़ रुपये के इनाम से काफी कम है। बीसीसीआई सचिव देवाजीत सैका ने स्पष्ट किया कि यह राशि पूरी यूनिट के लिए है, जिसमें टीम, कोचिंग और सपोर्ट स्टाफ शामिल हैं। उन्होंने कहा, “1983 में कपिल देव ने भारतीय क्रिकेट के नए युग की शुरुआत की थी, और आज हमारी महिलाओं ने वही जोश और गौरव वापस लाया है।” इस कथन से महिला टीम की उपलब्धि की महत्ता झलकती है, परंतु इनाम की असमानता आलोचना का विषय बनी हुई है।
विश्लेषकों का मानना है कि मैच‑फीस में समानता लागू करना एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन उपलब्धि‑आधारित पुरस्कारों और संसाधनों के वितरण में अब भी लैंगिक फर्क मौजूद है। महिलाओं को खेलने, मेहनत करने और जीत हासिल करने के बाद भी उस स्तर की आर्थिक मान्यता नहीं मिल रही जो पुरुष खिलाड़ियों को प्राप्त होती है। यह अंतर केवल पैसों का नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और अवसरों का भी है। जब तक महिला खिलाड़ियों को उचित प्रचार, मीडिया कवरेज और ब्रांड समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक खेल में वास्तविक समानता स्थापित नहीं हो सकती।
समानता केवल नियमों की पुस्तिका में लिखे शब्दों से नहीं आती; उसे व्यवहार और नीतियों में उतारना पड़ता है। महिला टीम ने साबित किया है कि प्रतिभा और प्रदर्शन में किसी तरह की कमी नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि भारत का क्रिकेट प्रशासन और उससे जुड़े कॉरपोरेट प्रायोजक इस सफलता को स्थायी बदलाव में बदलें। विशेषज्ञों का सुझाव है कि बीसीसीआई को महिला क्रिकेट में अधिक निवेश करना चाहिए—स्टेडियम सुविधाओं से लेकर घरेलू लीग और ग्रासरूट कार्यक्रमों तक—ताकि महिलाएं न सिर्फ समान वेतन, बल्कि समान अवसर भी पा सकें।
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Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
