भारत के सामाजिक इतिहास में करुणा, साहस और कर्मयोग का पर्याय बन चुके मुरलीधर देविदास आमटे, जिन्हें देश-दुनिया बाबा आमटे के नाम से जानती है, की आज 18वीं पुण्यतिथि है। 9 फरवरी 2008 को उनका निधन हुआ था, लेकिन कुष्ठरोगियों के पुनर्वास, सामाजिक न्याय और मानव गरिमा के लिए उनका जीवनपर्यंत संघर्ष आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रेरक है। बाबा आमटे ने अपना पूरा जीवन समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग—विशेषकर कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के पुनर्वास और सशक्तिकरण—के लिए समर्पित कर दिया। इसी कारण उन्हें भारत का “आधुनिक गांधी” कहा जाता है।


एक संपन्न परिवार से सेवा के मार्ग तक:

बाबा आमटे का जन्म महाराष्ट्र के वर्धा ज़िले के हिंगणघाट शहर में एक संपन्न देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता देविदास आमटे ब्रिटिश काल में जिला प्रशासन और राजस्व विभाग से जुड़े सरकारी अधिकारी थे। बचपन में उन्हें “बाबा” नाम से पुकारा जाता था—यह नाम किसी संत की उपाधि नहीं, बल्कि माता-पिता का स्नेहसूचक संबोधन था, जैसा कि उनकी पत्नी साधनाताई आमटे ने स्वयं स्पष्ट किया।

कानून की पढ़ाई करने के बाद बाबा आमटे का जीवन एक निर्णायक मोड़ पर तब आया, जब उन्होंने कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों की अमानवीय स्थिति को बेहद करीब से देखा। उसी क्षण उन्होंने यह निश्चय किया कि वे अपना जीवन इन उपेक्षित लोगों के सम्मान, अधिकार और पुनर्वास के लिए समर्पित करेंगे।


नर्मदा बचाओ आंदोलन में सहभागिता:

साल 1990 में बाबा आमटे ने कुछ समय के लिए आनंदवन छोड़कर नर्मदा नदी के तट पर रहना चुना। वे नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े, जो सरदार सरोवर बांध के कारण होने वाले विस्थापन और पर्यावरणीय नुकसान के खिलाफ संघर्ष कर रहा था। इस आंदोलन में उन्होंने मेधा पाटकर जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर स्थानीय निवासियों के अधिकारों की आवाज़ बुलंद की।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान:

बाबा आमटे के कार्यों को देश और दुनिया में व्यापक मान्यता मिली। उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें प्रमुख हैं:

  • पद्म श्री – 1971
  • पद्म विभूषण – 1986
  • संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार – 1988
  • रमन मैग्सेसे पुरस्कार
  • गांधी शांति पुरस्कार
  • टेम्पलटन प्राइज़
  • डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार
  • जमनालाल बजाज पुरस्कार


आनंदवन: विचार से आंदोलन तक:

बाबा आमटे ने गांधीवादी दर्शन को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि उसे जमीन पर उतारा। उन्होंने महाराष्ट्र में आनंदवन की स्थापना की—एक ऐसा आत्मनिर्भर समुदाय, जहाँ कुष्ठ रोग से पीड़ित लोग सम्मान के साथ जीवन जी सकें। खादी वस्त्र पहनना, सादगीपूर्ण जीवन, श्रम आधारित अर्थव्यवस्था और ग्राम उद्योग—ये सभी गांधी के सिद्धांत आनंदवन में जीवंत रूप में दिखाई दिए।


9 फरवरी 2008 को बाबा आमटे के निधन के साथ एक युग का अंत हुआ, लेकिन उनकी विचारधारा आज भी जीवित है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सेवा केवल दया नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार का प्रश्न है। बाबा आमटे का जीवन भारत के सामाजिक चेतना इतिहास में एक ऐसी मशाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को मानवता, साहस और कर्म की राह दिखाती रहेगी।


Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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