PAN कार्ड केस में दोषी ठहराए आज़म खान का रिएक्शन; “गुनाह साबित है तो सजा दो”
रामपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने दो पैन कार्ड फर्जीवाड़ा मामले में समाजवादी पार्टी नेता आज़म खान और उनके बेटे अब्दुल्लाह आज़म को सात-सात साल की सजा सुनाई। चुनावी दस्तावेज़ों में कथित जालसाजी और फर्जी उम्र दिखाने के आरोप साबित हुए। फैसले के बाद दोनों को जिला कारागार भेजा गया। मामला 2016 से चल रहा था।

रामपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने दो पैन कार्ड फर्जीवाड़ा प्रकरण में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आज़म खान तथा उनके बेटे और पूर्व विधायक अब्दुल्लाह आज़म को दोषी ठहराते हुए सात-सात साल की सजा सुनाई। फैसले के तुरंत बाद दोनों को कड़ी सुरक्षा में जिला कारागार भेज दिया गया। अदालत परिसर से बाहर निकलते समय जब मीडिया ने आज़म खान से प्रतिक्रिया चाही, तो उन्होंने बेहद संक्षिप्त स्वर में कहा, “अब क्या कहना है, कोर्ट का निर्णय है… गुनहगार समझा तो सजा सुनाई है।”
यह मामला वर्ष 2016 में सामने आया था, जिसकी जड़ें 2017 के विधानसभा चुनाव से जुड़ी हैं। स्वार सीट से अब्दुल्लाह आज़म ने अपना नामांकन दाखिल किया था। दस्तावेज़ों में उनकी वास्तविक जन्मतिथि 1 जनवरी 1993 थी, जिससे उनकी आयु 24 वर्ष होती थी. जबकि चुनाव लड़ने के लिए 25 वर्ष की आयु अनिवार्य है। आरोप है कि इस बाधा को दूर करने के लिए कथित साजिश रची गई और एक दूसरा पैन कार्ड तैयार कराया गया, जिसमें जन्मतिथि 30 सितंबर 1990 दर्ज की गई। यही कार्ड बैंक पासबुक और नामांकन पत्र में इस्तेमाल किया गया, जिसके आधार पर अब्दुल्लाह की उम्मीदवारी मान्य हुई और वे विधायक बने।
2019 में भाजपा नेता आकाश सक्सेना की शिकायत पर इस मामले में FIR दर्ज हुई। पुलिस ने जांच के बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत मुकदमा दायर किया। अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद पिता–पुत्र को सभी गंभीर आरोपों में दोषी पाया। विशेष न्यायाधीश शोभित बंसल ने धारा 467 के तहत अधिकतम सात वर्ष की सजा और दस हजार रुपये का जुर्माना निर्धारित किया, जिसे दोनों को भुगतना होगा।
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब हाल ही में आज़म खान 23 सितंबर को सीतापुर जेल से जमानत पर रिहा हुए थे। कई पुराने मामलों में राहत मिलने के बावजूद यह नया निर्णय उनकी कानूनी चुनौतियों को और जटिल बनाता नजर आ रहा है। वहीं, अब्दुल्लाह आज़म के लिए भी अदालत का यह आदेश राजनीतिक और कानूनी भविष्य को गहराई से प्रभावित करने वाला माना जा रहा है।
रामपुर में अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। यह मामला सिर्फ फर्जी दस्तावेज़ों का नहीं, बल्कि चुनावी नैतिकता और पारदर्शिता पर उठे बड़े सवालों का भी प्रतिबिंब बन गया है।
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Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
