Himanta Biswa Sarma Batadrava Than : पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर सदियों पुराने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों ने एक बार फिर देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है. असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने मंगलवार को असम और मणिपुर के बीच के अत्यंत गहरे ऐतिहासिक संबंधों पर प्रकाश डालते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश साझा किया है. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इन दोनों पूर्वोत्तर राज्यों की समृद्ध वैष्णव परंपराएं और सांस्कृतिक मूल्य इस संपूर्ण क्षेत्र की साझा सभ्यतागत विरासत को निरंतर और अधिक मजबूती प्रदान कर रहे हैं. मध्यकालीन महान संत-सुधारक महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव की पावन जन्मस्थली और पूजनीय धार्मिक स्थल श्री श्री बटाद्रवा थान से जारी इस आधिकारिक संदेश ने पूर्वोत्तर की एकता और अखंडता को एक नया वैचारिक आयाम दे दिया है, जिसने दोनों राज्यों के नागरिकों के बीच एक सकारात्मक और भावुक विमर्श को जन्म दे दिया है.

इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक जुड़ाव को देश के सामने लाने के लिए असम के मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ का सहारा लिया. नगांव जिले में स्थित श्री श्री बटाद्रवा थान परिसर में आयोजित एक भव्य धार्मिक कार्यक्रम के बाद उन्होंने एक विशेष वीडियो पोस्ट किया. मुख्यमंत्री ने भावुक और कूटनीतिक शब्दों में लिखा कि असम के पारंपरिक और पवित्र वाद्य यंत्र ‘खोल’ और मणिपुर के सुप्रसिद्ध पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘पंग’ की जुगलबंदी से उत्पन्न सुर लहरियों और संगीतमय गूंज ने एक बार फिर पूरे उत्तर-पूर्व की सांस्कृतिक समरसता को जीवंत कर दिया है. धार्मिक स्थल पर दोनों राज्यों के कलाकारों द्वारा दी गई भक्तिपूर्ण प्रस्तुतियों ने यह साबित कर दिया है कि भले ही प्रशासनिक सीमाएं अलग हों, लेकिन दोनों राज्यों की आत्मा आज भी श्रीमंत शंकरदेव और वैष्णव दर्शन के एक ही सूत्र से बंधी हुई है.

यदि इस ऐतिहासिक संबंधों की गहराई की पड़ताल की जाए, तो असम और मणिपुर के बीच का यह सांस्कृतिक सेतु कई सदियों पुराना है. यह मुख्य रूप से 15वीं और 16वीं शताब्दी के दौरान असम की पावन धरती पर श्रीमंत शंकरदेव द्वारा प्रारंभ किए गए ऐतिहासिक नव-वैष्णव आंदोलन के प्रसार से जुड़ा हुआ है. भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति, सामाजिक सद्भाव, कुरीतियों के उन्मूलन और आध्यात्मिक समावेशिता पर केंद्रित इस व्यापक सुधारवादी आंदोलन का प्रभाव असम की सीमाओं को लांघकर मणिपुर की वादियों तक पहुंचा था. आधिकारिक ऐतिहासिक दस्तावेजों और इतिहासकारों के शोध के अनुसार, 18वीं शताब्दी के दौरान तत्कालीन मेइतेई राजाओं के विशेष संरक्षण में वैष्णव धर्म मणिपुरी समाज की जीवन शैली में गहराई से रच-बस गया था. असम की ऐतिहासिक ‘सत्र’ संस्कृति, वहां के अनूठे भक्ति संगीत और प्रदर्शन कलाओं के सीधे प्रभाव से ही मणिपुर की आधुनिक धार्मिक और शास्त्रीय नृत्य परंपराओं का धीरे-धीरे क्रमिक विकास हुआ.

यह साझा सभ्यतागत विरासत आज भी दोनों राज्यों के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है. मिट्टी से निर्मित विशिष्ट ताल वाद्य यंत्र असम का ‘खोल’, जो असमिया सत्रिया नृत्य और नामघर परंपराओं का केंद्र बिंदु है, और दूसरी तरफ मणिपुर का ‘पुंग’, जो मणिपुरी शास्त्रीय भक्ति नृत्य और संकीर्तन का एक अनिवार्य हिस्सा है, ये दोनों ही वाद्य यंत्र मूल रूप से वैष्णव अनुष्ठानों के अभिन्न अंग हैं. मुख्यमंत्री द्वारा साझा किए गए आधिकारिक वीडियो और संदेश ने यह रेखांकित किया है कि दशकों के राजनीतिक और सामाजिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, त्योहारों, भक्ति संगीत, नृत्य कलाओं और धार्मिक संस्थानों के निरंतर आदान-प्रदान ने इस ऐतिहासिक रिश्ते को अटूट बनाए रखा है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस सांस्कृतिक महामिलन का संदेश न केवल पूर्वोत्तर में शांति और विकास की नई इबारत लिखेगा, बल्कि पूरे देश को क्षेत्रीय विविधताओं के बीच अंतर्निहित एकात्मता का एक अत्यंत प्रभावशाली और प्रेरक पाठ भी पढ़ाएगा.

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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