मजदूर नहीं, आधुनिक भारत के असली विश्वकर्मा! जानिए कैसे बिहार के पसीने से सींची गई देश की समृद्धि
यह लेख भारत के विकास में बिहार के ऐतिहासिक और वर्तमान योगदान का एक व्यापक विश्लेषण है। नालंदा और आर्यभट्ट की बौद्धिक विरासत से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण में प्रवासी श्रमिकों और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका तक, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर राकेश जैन के विचारों के साथ पढ़ें कैसे बिहार अपनी पुरानी चुनौतियों को पीछे छोड़ स्टार्टअप और शिक्षा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।

राकेश जैन- असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, गीतांजलि कॉलेज, उदयपुर
भारत के विकास में बिहार का योगदान इतना गहरा है कि कई इतिहासकार इसे “भारत की बौद्धिक धरोहर का केंद्र” बताते हैं। सुप्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर और आर.एस. शर्मा ने अपनी पुस्तकों में बार-बार उल्लेख किया है कि प्राचीन भारत की ज्ञान परंपरा का मूल बिहार की धरती में बसता है।
बिहार में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय (5वीं शताब्दी) को इतिहासकारों ने “विश्व का पहला रेज़िडेंशियल विश्वविद्यालय” कहा है, जहाँ दस हज़ार से अधिक विद्यार्थी और दो हज़ार शिक्षक थे। इसी तरह विक्रमशिला विश्वविद्यालय में बौद्ध दर्शन और तंत्र साधना पर व्यापक शोध होता था। महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने इसी मिट्टी से निकलकर शून्य, पाई के मान और ग्रहों की गति पर ऐसे सिद्धांत दिए जिनसे पूरी दुनिया प्रभावित हुई। कूटनीति के जनक चाणक्य ने मगध साम्राज्य से प्रशासन और अर्थनीति की वह नींव रखी जो आज भी भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की आधारशिला मानी जाती है।
भारत की प्रगति की कहानी में बिहार का योगदान ऐतिहासिक और वर्तमान, दोनों स्तरों पर बेहद महत्वपूर्ण है। आज़ादी के बाद भी बिहार ने देश को अनगिनत विद्वान, प्रशासक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर और उद्यमी दिए। देशभर में जहाँ भी नज़र डालें, वहाँ किसी न किसी रूप में बिहारी अपनी मेहनत और लगन से योगदान करते दिखाई देते हैं।
स्वतंत्र भारत में बिहारी योगदान
आजादी के बाद भी बिहार की प्रतिभा देश का नेतृत्व करती रही। योजना आयोग के उपाध्यक्ष और अर्थशास्त्री प्रो. के.एन. राज ने भारत की प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वैज्ञानिक डॉ. सत्येंद्र बोस (जिनके नाम पर बोसॉन कण का सिद्धांत है) का उद्भव भी बिहार से जुड़ा हुआ है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, भारत के सर्वाधिक सम्मानित नेताओं में से एक, बिहार से थे। देश के अनेक मुख्य न्यायाधीशों, IAS, IPS और IFS अधिकारियों का एक बड़ा हिस्सा बिहार से आता रहा है। UPSC डेटा दर्शाता है कि हर वर्ष चयनित उम्मीदवारों में 10–12% विद्यार्थी बिहार और पूर्वी भारत से होते हैं।
मेहनत का केंद्र: प्रवासी बिहारी समुदाय
नेशनल सैंपल सर्वे (NSSO, 2019) और नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में प्रवासी श्रमिकों की सबसे बड़ी संख्या बिहार से आती है। पंजाब-हरियाणा की हरित क्रांति में बिहारी मजदूरों ने सबसे बड़ी श्रमिक शक्ति उपलब्ध कराई। मुंबई, दिल्ली, सूरत, कोलकाता और बेंगलुरु के निर्माण कार्यों, परिवहन और उद्योगों में बिहारी श्रमिकों की मेहनत ने अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत की। विश्व बैंक की 2020 की रिपोर्ट बताती है कि खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय मजदूरों में एक उल्लेखनीय हिस्सा बिहार से है। देश की आर्थिक वृद्धि में यह योगदान अमूल्य है लेकिन इसे अक्सर आँकड़ों में नहीं आँका जाता।
अब बदल रहा है बिहार
पिछले एक दशक में बिहार शिक्षा, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य के क्षेत्र में तेज़ी से उभर रहा है। नीति आयोग का SDG Index (2021-22) दर्शाता है कि बिहार ने शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार किया है। स्टार्टअप नीति 2022 के अनुसार, राज्य में IT/ITeS, ई-कॉमर्स और एग्री-टेक के क्षेत्र में तेजी से नए स्टार्टअप बन रहे हैं। G20 द्वारा जारी Skill Development Report में बिहार के युवाओं की “मेहनत और अनुकूलन क्षमता” की विशेष प्रशंसा की गई है। यह बदलाव बताता है कि बिहार की पहचान अब केवल पलायन या गरीबी नहीं, बल्कि प्रतिभा, मेहनत और उद्यमिता से बन रही है।
आज लाखों बिहारी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और गुजरात जैसे औद्योगिक शहरों में काम कर रहे हैं। पंजाब और हरियाणा के खेतों से लेकर खाड़ी देशों की इमारतों तक बिहारी श्रमिकों का पसीना बह रहा है। उनकी मेहनत ने न सिर्फ़ दूसरे राज्यों बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूती दी है। शिक्षा के क्षेत्र में भी बिहारी युवाओं ने हमेशा परचम लहराया है। आँकड़े बताते हैं कि UPSC में सफल होने वाले उम्मीदवारों में बड़ी संख्या बिहार और उत्तर भारत के छात्रों की होती है। मेडिकल और इंजीनियरिंग परीक्षाओं में भी बिहारी छात्रों ने लगातार अपनी क्षमता साबित की है।
फिर भी दुर्भाग्य से “बिहारी” शब्द कई बार मज़ाक या तिरस्कार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसकी जड़ें राज्य में लंबे समय तक चले अविकास, राजनीतिक अस्थिरता और पलायन में छिपी हैं। लाखों लोगों को काम की तलाश में अपना गाँव-घर छोड़कर दूसरे राज्यों में मज़दूरी करनी पड़ती है। वहाँ उनकी पहचान केवल मजदूर तक सीमित कर दी जाती है। यही कारण है कि समाज में उनकी मेहनत का सम्मान कम और बदनामी ज़्यादा होती है। लेकिन यह छवि वास्तविकता नहीं है, बल्कि सोच की कमी है। जब यही बिहारी विदेश जाकर वैज्ञानिक, प्रोफेसर या डॉक्टर बनते हैं, तो वही समाज उन पर गर्व भी करता है।
अब समय आ गया है कि बिहारी समाज अपनी पहचान बदलकर नए आयाम गढ़े। केवल नौकरी और मज़दूरी पर निर्भर रहने के बजाय शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता और तकनीकी नवाचार की ओर बढ़ना होगा। बिहार के युवाओं में अपार प्रतिभा है, ज़रूरत है तो केवल अवसर और दिशा देने की। राज्य सरकार की भूमिका भी इसमें अहम है। अगर बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और उद्योग की सुविधाएँ विकसित होंगी तो पलायन अपने आप कम हो जाएगा। आईटी सेक्टर और स्टार्टअप नीतियों को बढ़ावा देकर बिहार को उद्योग और तकनीक का नया केंद्र बनाया जा सकता है।
साथ ही समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। “बिहारी” को एक गाली नहीं बल्कि गर्व की पहचान बनाया जाना चाहिए। प्रवासी बिहारी अपनी मेहनत और ईमानदारी से यह साबित कर सकते हैं कि वे देश की प्रगति के असली निर्माता हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब बिहार ने अपनी ताकत दिखाई है, तब-तब उसने पूरे भारत का नेतृत्व किया है। आज ज़रूरत है कि सरकार और समाज मिलकर ऐसा माहौल बनाएँ जिसमें बिहारी अपने ही राज्य में अवसर पाएँ और ऊँचाइयाँ हासिल करें। तभी बिहार की असली पहचान बदनामी नहीं, बल्कि गौरव होगी और “बिहारी” शब्द सम्मान का प्रतीक बनेगा।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
