भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जिसे दुनिया भर में एएसआई (ASI) के नाम से जाना जाता है, आज भारत की सांस्कृतिक विरासत का सबसे सशक्त प्रहरी है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक संलग्न कार्यालय के रूप में, यह संस्था देश के 3650 से अधिक प्राचीन स्मारकों, पुरातात्विक स्थलों और राष्ट्रीय महत्व के अवशेषों के प्रशासन और संरक्षण के लिए उत्तरदायी है। एएसआई की महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह केवल पत्थरों का रखरखाव नहीं करता, बल्कि भारत के गौरवशाली इतिहास की कड़ियों को जोड़कर उसे वर्तमान के सामने वैज्ञानिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत करता है। मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, मकबरों और किलों से लेकर प्राचीन गुफाओं और टीलों तक, एएसआई का कार्यक्षेत्र भारत की विविध पहचान को सुरक्षित रखने का मुख्य केंद्र है। वर्तमान में इसकी कमान महानिदेशक यदुबीर सिंह रावत के हाथों में है, जो देश भर में फैले 34 सर्किलों और हंपी, लेह एवं दिल्ली जैसे मिनी-सर्किलों के माध्यम से इस विशाल नेटवर्क का संचालन करते हैं।

इस प्रतिष्ठित संस्थान की जड़ें 19वीं शताब्दी के ब्रिटिश भारत में मिलती हैं। हालांकि व्यवस्थित शोध की शुरुआत 1784 में सर विलियम जोन्स द्वारा कलकत्ता में 'एशियाटिक सोसाइटी' की स्थापना के साथ हो गई थी, लेकिन एक समर्पित सरकारी निकाय के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना 1861 में हुई। इसके प्रणेता और पहले महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम थे, जिन्हें 'भारतीय पुरातत्व का जनक' माना जाता है। कनिंघम ने लॉर्ड कैनिंग के कार्यकाल के दौरान इस संस्थान को आकार दिया। हालांकि, शुरुआती वर्षों में धन की कमी के कारण इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, यहाँ तक कि 1888 से 1898 के बीच 'बक संकट' के दौरान इसे बंद करने तक की नौबत आ गई थी। लेकिन 1895 में निगाली सागर और 1896 में लुंबिनी स्तंभ जैसे ऐतिहासिक शिलालेखों की खोज ने संस्थान की उपयोगिता को सिद्ध कर दिया, जिससे सार्वजनिक और सरकारी मत इसके पक्ष में बदल गया।

संस्थान के इतिहास में एक बड़ा मोड़ तब आया जब 1902 में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने महानिदेशक के पद को बहाल किया और जॉन मार्शल की नियुक्ति की। कर्जन का मानना था कि प्राचीन स्मारकों का संरक्षण सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है। मार्शल के 25 वर्षों के लंबे कार्यकाल के दौरान ही 1921 में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसी सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों की खोज हुई, जिसने भारतीय इतिहास की प्राचीनता को दुनिया के नक्शे पर नए सिरे से स्थापित किया। इसी दौर में तक्षशिला की खुदाई शुरू हुई और 1904 का 'प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम' पारित हुआ, जिसने एएसआई को कानूनी मजबूती प्रदान की। आजादी के बाद, संस्थान ने अपनी वैज्ञानिक शाखा को और विस्तार दिया, जिसका मुख्य कार्यालय देहरादून में स्थापित किया गया, ताकि अवशेषों का रासायनिक उपचार और संरक्षण आधुनिक तकनीकों से किया जा सके।

स्वतंत्र भारत में एएसआई की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। 1958 में 'प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम' (AMASR Act) के पारित होने के बाद, पुरातात्विक सर्वेक्षण को संस्कृति मंत्रालय के सीधे संरक्षण में लाया गया। अमलानंद घोष और बी.बी. लाल जैसे दिग्गजों के नेतृत्व में कालीबंगन, लोथल और धोलावीरा जैसे सिंधु घाटी स्थलों की खुदाई हुई, वहीं अयोध्या जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर भी शोध किए गए। संस्थान ने अपनी पहली महिला महानिदेशक के रूप में देबला मित्रा को देखा, जिन्होंने 1981 में कार्यभार संभाला था। 1990 के दशक के बाद, महानिदेशक के पद पर पुरातत्वविदों के स्थान पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों की नियुक्ति की एक नई परंपरा शुरू हुई, जिसमें अचला मौलिक पहली ऐसी अधिकारी बनीं, जो समय-समय पर आज भी जारी है।

आज एएसआई केवल खुदाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थान है। इसकी केंद्रीय पुरातत्व पुस्तकालय में 1 लाख से अधिक दुर्लभ पुस्तकों और चित्रों का संग्रह है, जबकि 'म्यूजियम ब्रांच' देश भर में 50 से अधिक संग्रहालयों का रखरखाव करती है। संस्थान 'इंडियन आर्कियोलॉजी: ए रिव्यू' और 'एपिग्राफिया इंडिका' जैसे महत्वपूर्ण प्रकाशनों के माध्यम से शोध कार्यों को दुनिया के सामने लाता है। हालांकि, हाल के वर्षों में कैग (CAG) की रिपोर्टों और अदालतों द्वारा स्मारकों के रखरखाव में खामियों और कुछ स्थलों के गायब होने जैसी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है, लेकिन भारत की मिट्टी में दबे रहस्यों को उजागर करने और ताजमहल जैसे वैश्विक धरोहरों को अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखने में इस संस्थान की भूमिका अपरिहार्य बनी हुई है।

Pratahkal HQ

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