फुटबॉल से जुड़ी 52 Blue की कहानी, जहां Messi के सपने में तलाशा गया अपनापन
52 Blue फिल्म में फुटबॉल, Messi के सपने और परिवार के रिश्तों के जरिए अपनापन, प्रवासन और भावनाओं की अनोखी कहानी दिखाई गई है।

तस्वीर में फिल्म '52 Blue' के एक दृश्य को दर्शाया गया है, जिसमें पारंपरिक अरब शैली की मिट्टी के रंग वाली इमारतों की पृष्ठभूमि में एक युवक सफेद टी-शर्ट और मैरून शॉर्ट्स पहने हुए फुटबॉल के साथ दिखाई दे रहा है।
मिस्र के फिल्मकार अली एल-अरबी की फिल्म 52 Blue ने फुटबॉल के जरिए प्यार, प्रवासन और अपनेपन की तलाश की कहानी को सामने रखा है। यह फिल्म इस साल लंदन इंडियन फिल्म फेस्टिवल के 17वें संस्करण की शुरुआत करेगी और इसका प्रदर्शन BFI साउथबैंक में होगा।
फिल्म की कहानी फुटबॉल प्रशंसक आशीष (यादव शशिधर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने आदर्श अर्जेंटीना फुटबॉलर लियोनेल मेसी से मिलने का सपना देखता है। इस सपने के रास्ते में उसके पिता आते हैं, जिनकी भूमिका आदिल हुसैन ने निभाई है। वहीं उसकी मां लक्ष्मी का किरदार निभाने वाली नेहा धूपिया अपने बेटे का समर्थन करने वाली मजबूत भावनात्मक आधार बनती हैं।
52 Blue की कहानी कतर विश्व कप की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहां भारत के केरल गांव में रहने वाला एक अकेला युवा लड़का, जिसने अपने घर की चार दीवारों के बाहर बहुत कम दुनिया देखी है, अपने सपने की तलाश में निकल पड़ता है। इस सफर में वह खुद को और जिंदगी को नए तरीके से समझता है।
फिल्मकार अली एल-अरबी ने बताया कि इस फिल्म की प्रेरणा उन्हें 2022 के कतर विश्व कप के दौरान एक भारतीय कामगार से हुई मुलाकात से मिली। उन्होंने कहा, “मैं कतर विश्व कप में आशीष नाम के एक व्यक्ति से मिला। उसने बताया कि वह मेसी से मिलने के लिए भारत से काम करने कतर आया था। मैंने सोचा, यह एक फिल्म बननी चाहिए।”
फिल्म शुरुआत में एक खेल कहानी जैसी नजर आती है, लेकिन आगे बढ़ते हुए यह सीमाओं से परे जुड़ाव की कहानी बन जाती है। इसमें फुटबॉल को एक वैश्विक उद्योग के रूप में दिखाया गया है, जो प्रवासन और अलग-अलग संस्कृतियों को जोड़ता है।
फिल्म का नाम 52 Blue ‘52-hertz whale’ से प्रेरित है, जिसे अक्सर दुनिया की सबसे अकेली व्हेल कहा जाता है क्योंकि माना जाता है कि उसकी आवाज ऐसी आवृत्ति पर होती है जिसे दूसरी व्हेल सुन नहीं सकतीं। हालांकि इस वैज्ञानिक सिद्धांत पर सवाल भी उठते रहे हैं, लेकिन फिल्म में यह व्हेल अकेलेपन, प्रवासन और इस उम्मीद का प्रतीक बनती है कि कहीं न कहीं कोई सुनने वाला जरूर है। फिल्म में यह व्हेल उस नदी की गहराइयों में दिखाई देती है जिसे आशीष पार करता है।
मिस्र के फिल्मकार अली एल-अरबी ने कहा कि भारतीय कहानी के माध्यम से वह अपनी जिंदगी के अनुभवों को भी व्यक्त कर सके। उन्होंने भारतीय और मिस्र की पारिवारिक संस्कृति में समानताओं का जिक्र करते हुए कहा, “मैं खुश हूं कि मुझे भारतीय संस्कृति में अपने बारे में बात करने का मौका मिला। मिस्र और भारत में कई समानताएं हैं। मैं इस फिल्म के जरिए खुद को समझा पाया।”
उन्होंने कहा, “हमारा प्यार एक जैसा है, कभी-कभी नियंत्रण भी, जो प्यार की भावना से आता है। प्यार की भाषा एक जैसी होती है।”
अली एल-अरबी ने अपने निजी अनुभवों को साझा करते हुए कहा, “मैं खुद बनने के लिए अपने गांव से भाग गया था। यह बदलाव हमारे जीवन और फिल्म दोनों में महत्वपूर्ण है।” उन्होंने मूसा और उनकी मां की कहानी का उदाहरण देते हुए कहा, “आप मूसा और उनकी मां की कहानी जानते हैं, जब उन्होंने अपने बेटे को नाव में रखकर नदी में भेज दिया था। मेरी मां ने भी मेरे साथ ऐसा ही किया।”
उन्होंने बताया कि दक्षिण एशियाई और अरब परिवारों में प्यार को त्याग, जिम्मेदारी और अपेक्षाओं के साथ व्यक्त किया जाता है। जहां देखभाल और नियंत्रण के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है, वही भावनात्मक तनाव फिल्म की कहानी का हिस्सा है।
नेहा धूपिया के अनुसार फिल्म में लक्ष्मी का किरदार इसी जटिलता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि लक्ष्मी की मौजूदगी कहानी में एक उद्देश्य के साथ है। यह किरदार सुरक्षात्मक प्यार का दूसरा रूप दिखाता है, जो आशीष को रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। फिल्म माता-पिता को केवल नायक या खलनायक के रूप में पेश नहीं करती।
52 Blue में एक अन्य प्रमुख विषय यह है कि बहुत देर होने से पहले माता-पिता को समझने की कोशिश की जाए। अली एल-अरबी ने बताया कि फिल्म की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि दर्शकों ने इससे क्या महसूस किया।
उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा, “वॉशिंगटन में एक बच्चा मेरे पास आया और उसने कहा, ‘मुझे फिल्म बहुत पसंद आई, मैंने इसे देखकर बहुत आनंद लिया, लेकिन मैं अपनी मां और पिता को गले लगाना चाहता हूं क्योंकि पहली बार मुझे ऐसा लगता है कि मैं उन्हें समझ पाया हूं।’”
फिल्मकार ने कहा कि वह माता या पिता को नायक या खलनायक नहीं दिखाना चाहते थे, बल्कि उन पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी को दिखाना चाहते थे। उन्होंने कहा, “माता-पिता और बच्चों के बीच की दूरी को कम करने की कोशिश करना बहुत जरूरी है। कभी-कभी आप दूरी कम नहीं कर पाते और महसूस करते हैं कि उनके करीब आने के लिए इसे कम करना जरूरी था, लेकिन कभी-कभी समय नहीं बचता।”
52 Blue यह दिखाती है कि लोगों के बीच अलग रहने का समय नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने में लगने वाला समय ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। फिल्म गलतफहमी और पहचान के बीच उस दूरी को सामने रखती है, जहां पीढ़ियों के बीच संबंधों को समय निकलने से पहले मजबूत करने का सवाल उठता है।
फिल्म में घर को किसी एक जगह तक सीमित नहीं रखा गया है। आशीष अवसर, काम और सपनों की तलाश में सीमाएं पार करता है, लेकिन पीछे छूटे लोगों से उसका भावनात्मक रिश्ता बना रहता है। नेहा धूपिया ने कहा, “मेरे लिए अपनापन एक सुरक्षित जगह है। कोई भी जगह जिसे आप घर कह सकते हैं, वही मेरे लिए अपनापन है। व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह मेरी मां, पिता, मेरे पति और सबसे महत्वपूर्ण मेरे बच्चे हैं। पेशेवर रूप से मुझे भारतीय फिल्म उद्योग में अपनेपन की बड़ी भावना महसूस होती है।”
लक्ष्मी का किरदार इसी भावनात्मक केंद्र को मजबूत करता है। नेहा धूपिया ने कहा, “कुछ कहानियां बड़े जहाज जैसी होती हैं, लेकिन वे लंगर के बिना कुछ नहीं होतीं।” लक्ष्मी आशीष की यात्रा को नियंत्रित नहीं करतीं, बल्कि परिवार को भावनात्मक रूप से स्थिर बनाए रखती हैं।
52 Blue का लंदन इंडियन फिल्म फेस्टिवल के 17वें वर्ष की शुरुआत करना उस कहानी को सामने लाता है जो राष्ट्रीय सीमाओं के दायरे में बंधने से इनकार करती है। फिल्म में फुटबॉल पात्रों को जोड़ने वाला माध्यम है, लेकिन प्यार अपने सभी जटिल, अपूर्ण और सुरक्षात्मक रूपों में इसकी वास्तविक सार्वभौमिक भाषा बन जाता है।
अली एल-अरबी ने कहा, “मैं फिल्म उद्योग में ‘इंडिपेंडेंट’ शब्द का समर्थन नहीं करता। मैं उम्मीद करता हूं कि दुनिया के सभी कलाकार साथ मिलकर काम करें और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए कुछ अनोखा बनाएं। यह सही समय और सही पीढ़ी है, जो दुनिया के लिए एक समान सिनेमाई भाषा में कुछ प्रस्तुत कर सकती है।”

Pratahkal Bureau
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