संसद के विशेष सत्र में घमासान; आखिर क्यों महिला आरक्षण को लेकर BJP की मंशा पर उठाए गंभीर सवाल?
महिला आरक्षण बिल पर भड़के अखिलेश यादव, इसे बताया बीजेपी का 'धोखे का काला दस्तावेज'। सपा प्रमुख ने पिछड़ों और दलितों के खिलाफ साजिश का लगाया बड़ा आरोप।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव
Women's Reservation Bill 2026 : संसद के विशेष सत्र के बीच महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को लेकर देश की सियासत में उबाल आ गया है। आज गुरुवार, 16 अप्रैल को केंद्र सरकार द्वारा इस ऐतिहासिक माने जा रहे विधेयक को पेश किए जाने की तैयारी है, लेकिन सदन के पटल पर आने से पहले ही मुख्य विपक्षी दलों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने इस विधेयक पर अत्यंत तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे भारतीय जनता पार्टी का एक नया 'चुनावी जुमला' और पिछड़ों-दलितों के खिलाफ रची गई एक गहरी साजिश करार दिया है।
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक विस्तृत और आक्रामक पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने इस विधेयक को महज एक कागजी औपचारिकता बताते हुए इसे 'धोखे का काला दस्तावेज' करार दिया। सपा प्रमुख का आरोप है कि यह बिल दरअसल 'खुफिया लोगों की एक गुप्त योजना' है, जिसका एकमात्र उद्देश्य पिछड़े और दलित समाज की महिलाओं को शक्तिहीन बनाए रखना है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह विधेयक वर्चस्ववादी सोच की हताशा का परिणाम है और इसके जरिए वंचित वर्ग की महिलाओं को सच्चे जन प्रतिनिधित्व से दूर रखने का एक राजनीतिक चक्रव्यूह रचा जा रहा है।
विधेयक के समय और सरकार की मंशा पर प्रहार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि बीजेपी अब अपनी 'एक्सपायरी डेट' के अंतिम महीनों में चल रही है। उन्होंने दावा किया कि जैसे-जैसे सत्ताधारी दल का विरोध बढ़ रहा है, वैसे-वैसे वे 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की एकजुटता को तोड़ने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। यादव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जागरूक महिलाएं इस बार बीजेपी की इस 'कुटिल राजनीति' के मुखौटे को पहचान चुकी हैं और वे किसी भी तरह के छलावे में नहीं आएंगी। उनके अनुसार, यह बिल नारी के प्रति दमनकारी और सामंती सोच का परिचायक है, जो केवल सत्ता में बने रहने की एक हताश कोशिश मात्र है।
इस विवाद के बीच समाजवादी पार्टी के अन्य सांसदों ने भी तकनीकी और नीतिगत आधार पर सरकार को घेरा है। सपा सांसद बाबू सिंह कुशवाहा ने सरकार की जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस कानून को 2021 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लागू किया जाना था, लेकिन सरकार इसे आनन-फानन में बिना पूर्ण तैयारी के ला रही है। वहीं, सांसद वीरेंद्र सिंह ने चेतावनी दी कि यदि इस बिल की आड़ में अन्य गुप्त प्रावधानों को लागू करने की कोशिश की गई, तो सदन में तीखी बहस और कड़ा विरोध होना तय है। विपक्ष का मुख्य विरोध बिल में परिसीमन से जुड़े प्रावधानों और 'कोटा के भीतर कोटा' (OBC आरक्षण) की अनुपस्थिति को लेकर है।
जैसे-जैसे संसद की कार्यवाही आगे बढ़ रही है, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि महिला आरक्षण विधेयक केवल एक वैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि 2026 के आगामी राजनीतिक समीकरणों को साधने का एक बड़ा हथियार बन गया है। सरकार जहां इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर बता रही है, वहीं अखिलेश यादव और संपूर्ण विपक्ष ने इसे बीजेपी के पतन की शुरुआत और सामाजिक न्याय के साथ खिलवाड़ बताया है। अब देखना यह होगा कि सदन के भीतर इस 'काले दस्तावेज' बनाम 'ऐतिहासिक सुधार' की जंग में जीत किसकी होती है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
