नई दिल्ली। देश में गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा द्वारा उठाए गए सवालों के बीच इस महत्वाकांक्षी योजना की जमीनी स्थिति पर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। उनका कहना है कि वास्तविक और जरूरी मुद्दों से ध्यान हटाकर अभियान की सफलता का दावा किया जा रहा है, जबकि हालात इसके ठीक उलट नजर आते हैं।

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका, आशा वर्कर और गायनेकोलॉजिस्ट की भूमिका को सबसे अहम माना गया है। लेकिन जमीनी स्तर पर इन कर्मियों पर लगातार बढ़ता कार्यभार योजना की प्रभावशीलता को प्रभावित कर रहा है। आंगनबाड़ी सेविकाओं को स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ कई अतिरिक्त जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं, जिससे वे मानसिक और शारीरिक दबाव में काम करने को मजबूर हैं।

वहीं, आशा वर्करों की स्थिति और भी चिंताजनक बताई जा रही है। गर्भवती महिलाओं की देखभाल में उन्हें पूरे नौ महीनों तक लगातार सक्रिय रहना पड़ता है, लेकिन इसके बदले मिलने वाला मानदेय इतना सीमित है कि वे अपने परिवार के भरण-पोषण को लेकर असुरक्षित महसूस करती हैं। अस्पतालों तक महिलाओं को ले जाने के दौरान भी उन्हें बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है, जहां न ठहरने की उचित व्यवस्था होती है और न ही स्वच्छ शौचालय उपलब्ध होते हैं।

मातृत्व सेवाओं की सफलता का एक और महत्वपूर्ण आधार जिलों के अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता है। कई जिलों में गायनेकोलॉजिस्ट की भारी कमी के कारण गर्भवती महिलाओं को समय पर और समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा है। यह स्थिति न केवल योजना के उद्देश्य पर सवाल खड़े करती है, बल्कि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

इन तमाम परिस्थितियों ने प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान की जमीनी सच्चाई को उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कार्यकर्ताओं की समस्याओं, सुविधाओं की कमी और डॉक्टरों की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक इस अभियान का वास्तविक लाभ जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचना मुश्किल रहेगा।

Pratahkal Newsroom

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