संतान सुख और शांति की कामना का पर्व: देशभर में श्रद्धा के साथ मनाया गया सकट चौथ व्रत
6 जनवरी को देशभर में सकट चौथ का व्रत श्रद्धा के साथ मनाया गया। माताओं ने संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और पारिवारिक शांति के लिए निर्जल व्रत रखकर भगवान गणेश और माता सकट की पूजा की। यह पर्व आस्था, संस्कार और मातृत्व भावना का प्रतीक माना जाता है।

नई दिल्ली।
हिंदू पंचांग के अनुसार 6 जनवरी को देशभर में सकट चौथ का पावन व्रत श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक विधि-विधान के साथ मनाया गया। यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख-शांति की कामना के लिए किया जाता है। सुबह से ही मंदिरों और घरों में धार्मिक माहौल देखने को मिला, जहां माताओं ने निर्जल या फलाहार व्रत रखकर भगवान गणेश और माता सकट (चतुर्थी देवी) की पूजा-अर्चना की।
सकट चौथ को कई क्षेत्रों में तिलकुटा चौथ, वक्रतुंडी चौथ या माघी चौथ के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ता है और इसका विशेष महत्व संतान सुख से जुड़ा माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सच्चे मन से किया गया व्रत और पूजा बच्चों को संकटों से बचाती है और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
सुबह तड़के ही महिलाओं ने स्नान कर व्रत का संकल्प लिया और घरों में स्वच्छता के साथ पूजा की तैयारी की। दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को चंद्रमा दर्शन के पश्चात व्रत पारण किया गया। पूजा में भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के समक्ष तिल, गुड़, तिलकुट, दूर्वा, मोदक और दीपक अर्पित किए गए। कई स्थानों पर सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन और कथा वाचन का आयोजन भी हुआ।
धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं के अनुसार सकट चौथ का संबंध उस कथा से जुड़ा है, जिसमें माता पार्वती ने अपने पुत्र गणेश के लिए यह व्रत रखा था। कहा जाता है कि इसी व्रत के प्रभाव से भगवान गणेश सभी संकटों से मुक्त हुए। तभी से यह व्रत माताओं द्वारा संतान की रक्षा और समृद्धि के लिए किया जाने लगा।
देश के विभिन्न हिस्सों में सकट चौथ को लेकर खास उत्साह देखा गया। उत्तर भारत के कई राज्यों में मंदिरों के बाहर भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं। सोशल मीडिया पर भी महिलाओं ने व्रत, पूजा और चंद्र दर्शन से जुड़ी तस्वीरें साझा कीं, जिससे यह पर्व डिजिटल माध्यमों पर भी चर्चा में रहा।
धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, सकट चौथ केवल एक व्रत नहीं बल्कि संस्कार, धैर्य और मातृत्व भावना का प्रतीक है। यह पर्व माता और संतान के रिश्ते की गहराई को दर्शाता है और समाज में पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करता है। बदलते समय में भी इस व्रत की परंपरा का जीवित रहना भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों को दर्शाता है।
सकट चौथ के अवसर पर कई मंदिरों और सामाजिक संगठनों द्वारा जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्र दान किए गए। इससे व्रत के साथ-साथ सेवा और करुणा का भाव भी देखने को मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे धार्मिक पर्व न केवल आस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि समाज में आपसी सहयोग और सद्भाव को भी बढ़ावा देते हैं।
अंततः, 6 जनवरी को मनाया गया सकट चौथ यह संदेश देता है कि आस्था और विश्वास के साथ किए गए कर्म जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। संतान के सुख और परिवार की शांति की कामना से जुड़ा यह व्रत आज भी उतनी ही श्रद्धा से मनाया जा रहा है, जितना सदियों पहले मनाया जाता था।

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