फिलीपींस की खदानों से कथित तौर पर मिले दो रहस्यमय अवशेषों ने इतिहास और पुरातत्व की दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। बेंगलुरु के एक शोधकर्ता और व्यवसायी द्वारा किए गए इस दावे ने न केवल प्राचीन भारतीय सभ्यता की संभावित वैश्विक पहुंच पर चर्चा शुरू कर दी है, बल्कि इसकी प्रमाणिकता को लेकर भी विशेषज्ञों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बेंगलुरु के शोधकर्ता और व्यवसायी सैयद शमीर हुसैन ने दावा किया है कि उन्हें फिलीपींस की एक खदान में खुदाई के दौरान दो प्राचीन वस्तुएँ मिलीं- एक त्रिशूल और एक वज्र। उनके अनुसार, यह त्रिशूल लगभग 10,000 वर्ष पुराना है और इसे भगवान शिव से जोड़ा जाता है, जबकि दूसरा अवशेष 3,000 वर्ष पुराना वज्र है, जिसे पौराणिक कथाओं में इंद्र का अस्त्र माना जाता है।


शमीर हुसैन के अनुसार, यह खोज वर्ष 2015 में फिलीपींस की एक सोना और तांबा खदान में खनन के दौरान सामने आई थी। उन्होंने बताया कि इन वस्तुओं को उन्होंने 2016 में भारत लाकर सुरक्षित रखा और कई वर्षों तक उनका अध्ययन किया। लंबे शोध के बाद उन्होंने इन अवशेषों को सार्वजनिक रूप से पेश किया और बेंगलुरु में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इनकी जानकारी साझा की। उनका दावा है कि ये वस्तुएँ इस बात का संकेत देती हैं कि प्राचीन भारतीय सभ्यता का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया तक बहुत पहले से मौजूद था।

हालांकि, इस दावे के सामने आते ही पुरातत्व और इतिहास के क्षेत्र से जुड़े कई विशेषज्ञों ने इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक इन वस्तुओं की आयु या मूल का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया है।

सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि इन अवशेषों की वैज्ञानिक डेटिंग अभी तक किसी मान्यता प्राप्त पद्धति से प्रमाणित नहीं की गई है। सामान्य तौर पर प्राचीन वस्तुओं की उम्र तय करने के लिए कार्बन डेटिंग या अन्य वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है, लेकिन इस मामले में ऐसी कोई पुष्टि अभी तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।


इसके अलावा, यह खोज किसी आधिकारिक पुरातात्विक खुदाई का हिस्सा नहीं थी। आमतौर पर ऐतिहासिक खोजों को विश्वविद्यालयों, संग्रहालयों या राष्ट्रीय विरासत एजेंसियों की निगरानी में दर्ज किया जाता है, ताकि उनकी प्रमाणिकता और संदर्भ स्पष्ट हो सके। इस मामले में वस्तुएँ खनन गतिविधि के दौरान मिलने का दावा किया गया है, जिससे उनके ऐतिहासिक संदर्भ को लेकर और भी सवाल उठ रहे हैं।

कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि इन वस्तुओं की कलात्मक शैली और संरचना पारंपरिक प्राचीन भारतीय शिल्पकला से पूरी तरह मेल नहीं खाती। इसी कारण कई विशेषज्ञ इस दावे को सावधानी के साथ देखने की सलाह दे रहे हैं। हालांकि, इस विवाद के बीच इतिहासकार यह भी स्वीकार करते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति का प्रभाव ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है। कई पुरातात्विक खोजें इस बात का संकेत देती हैं कि प्राचीन भारत और फिलीपींस के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध मौजूद थे।


इनमें प्रमुख उदाहरण शामिल हैं:

  • अगुसान प्रतिमा – मिंदानाओ क्षेत्र से मिली एक स्वर्ण मूर्ति, जिसे 9वीं-10वीं शताब्दी के हिंदू-बौद्ध प्रभाव से जोड़ा जाता है।
  • लगुना कॉपरप्लेट अभिलेख – एक ऐतिहासिक ताम्रपत्र, जिसकी भाषा में संस्कृत का प्रभाव देखा गया है।
  • मैक्टन गणेश प्रतिमा – फिलीपींस में पाई गई एक मूर्ति जो हिंदू देवता गणेश की छवि से मेल खाती है।

इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन काल में समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया के कई क्षेत्रों तक पहुँचा, विशेष रूप से 500 से 1400 ईस्वी के बीच।

फिलीपींस की खदानों से मिले कथित त्रिशूल और वज्र का दावा अभी भी जांच और बहस का विषय बना हुआ है। जब तक इन वस्तुओं पर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन और आधिकारिक पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक यह खोज इतिहास की एक रोचक लेकिन विवादित कहानी के रूप में ही देखी जा रही है जो यह संकेत जरूर देती है कि प्राचीन सभ्यताओं के संबंधों की कहानी अभी पूरी तरह सामने आना बाकी है।


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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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